Monday, August 31, 2009

कुछ शेर

जो नही है सामने, होता बयाँ
नजर को ना चाहिए कोई जुबाँ

इन्सान के जेहन ने जो भी रची है दुनिया
भगवान दब चुका है उसके वजन के नीचे

घडे में भर गया पानी जगह कोई नही खाली
कहाँ से साँस लेगा अब घडे का अपना खालीपन

............................................................................ अरुण

Sunday, August 30, 2009

कुछ शेर

तमन्ना बेइख्तियार हुई
बदनाम दिल हुआ बेजा

की कौम की तारीफ तो बढ़ी इस्मत
ख़ुद की जरा सी की तो मिली रुसवाई

है इल्म कि नापाक इरादे फिरभी
जी सकता हूँ दुनिया के बदस्तूर
...................................................... अरुण

Saturday, August 29, 2009

कुछ शेर

सोचने को भी न बच पाए समय
ऐसे संकट में निकल आती है राह

किसी भी चीज जगह का नही है नाम सच
दिखना के असल क्या है, सच हुआ

ख्यालात उभरते हैं, बनते हुए इक शीशा
शीशे में उभरता 'मै', ख्यालात चलाता है
.............................................................. अरुण

Friday, August 28, 2009

दो दोहे

समाज और परिवार द्वारा संस्कारित मन कभी भी आजाद नही है
पहले मिर्ची खाय दे सो फिर जले जुबान
मीठा तीता सामने चुन मेरे मेहमान

मन को साधन बना कर जो जी पाए वह आनंदित है
जो मन में उलझ गया वह त्रस्त है
चढ़ चक्के पर होत है दुनिया भर की सैर
जो चक्के में खो गया उसकी ना कुई खैर
.................................................................. अरुण

Thursday, August 27, 2009

कुछ शेर

पेड़ गर चाहे नया होना कभी हो न सके
बीज बदले तो सारा रूप रंग ही बदले

मै न जानू 'उसे' पर मैंने 'उसे' मान लिया
मै न जानू - कहने में डर सा लगता है

वैसे नही जुदा कुदरत से कोई बंदा
एहसास खो गया है इसबात का मगर
....................................................... अरुण

Wednesday, August 26, 2009

कुछ शेर

कुई छोटा बड़ा कोई, हकीकत है भुलाएँ क्यों
दिलों से दिल मिलें हों तो बराबर के सभी रिश्ते

जेहन में हो अगर झगडा किसी भी दो खयालों का
मुसल्लम जिन्दगी जीना नही मुमकिन किसी को भी

हिफाजत के लिए जो बीच खीची हैं लकीरें
सरहदें हैं, डराती आदमी को आदमी से
.................................................... अरुण

Tuesday, August 25, 2009

कुछ शेर

सुकून मिल न सके ख्याले सुकूं के आते
शोर को पूरी तरह देखे वही पाता सुकून

चलती गाड़ी का ही हो चाक बदलना जैसे
जीते जी ख़ुद की मौत देख पाना बामुश्किल

होश को जो भी दिखे, सच है वही
पुस्तकों में जो लिखा, सब झूठ है
........................................................ अरुण

Sunday, August 23, 2009

असीम से ससीम

पैदा होते धरती पर आया
तब मै असीम था
न था मेरा कोई नाम, पता और परिचय
सारी जमीन, सारा सागर, सारा आसमान
मेरा अपना था
पर आज ...
एक छोटे से नाम और परिचय का
मै मुहताज हूँ
........................ अरुण

Saturday, August 22, 2009

होश बेहोश

रिक्त आया था, रिक्त जाऊंगा
रिक्त हूँ हर क्षण मगर 'बेहोश' हूँ

'होश में हूँ'- जानना काफी नही
अपनी 'बेहोशी' का दिखना होश है

'बेहोश' = सांसारिकता के प्रकाश में निद्रस्थ
.................................................................. अरुण

Friday, August 21, 2009

दस्तूर

आँखों को फोड़ने का दस्तूर रखके कायम
बंदिश को तोड़ने की बातें चला रहे हैं

आधी मुहब्बत का पूरा पूरा दस्तूर
दुनिया तो चल रही है सम्भलते गिरते

जंगे आजादी है जिन्दा दुनिया में
सिलसिलाए दस्तूर चल पड़ा जबसे
............................................ अरुण

Thursday, August 20, 2009

कुछ शेर

असलियत गौर से हट जाए भरम जाए पसर
गौर की वापसी तक, बन्दा बन्दा है पागल

तुलने ओ तौलने की मिली जो तालीम
न किसी बात का भी असली वजन जाना है

रिश्तों के आइनों में, बनते बिगड़ते रूप
यारों से दुश्मनी हो दुश्मन से दोस्ती
................................................... अरुण

Wednesday, August 19, 2009

कुछ शेर

पिंजडे की मुहब्बत में उलझा हुआ ये पंछी
पूछे की उडूं कैसे आजाद मिजाजी से

है बदनसीब इंसा का जहन
जानने से पहले ही जानता कुछ कुछ

जिंदगी में दो और दो चार नही
समझे जो हकीकत लाचार नही

....................................................... अरुण

Tuesday, August 18, 2009

कुछ शेर

निकलते आँख से आंसू कभी तेरे कभी मेरे
अलहिदा है नही ये गम के तेरा हो के मेरा हो

प्यार में अपने पराये का नही कोई हिसाब
ऐसा मंजर है कि जिसमें कोई बटवारा नही

हर कुई मजबूर लेकर जिन्दगी की दास्ताँ
कुछ ही करते आप अपने दास्ताँ की जुस्तजू
..................................................... अरुण

Sunday, August 16, 2009

दो शेर

कुदरत जो फैलती फिर इन्सान क्यों नही
छोटे से नजरिये का छोटा सा आसमान

ख़ुद जो बन गया रौशनी अपनी
रास्तों ओ कोशिशों की न वजह उसको

........................................................... अरुण

कुछ शेर

इस पल में जिन्दगी या इस पल में मौत है
खामोश आसमां या तूफान ऐ जहन

अच्छाई ओ बुराई दोनो जुदा जुदा
रिश्ता न बीच में जो काम आये

अपनी जगह पे ठहरा वो तो अज़ाद है
खिसका इधर उधर जो वो तो बंधा बंधा
(इधर = अतीत, उधर= भविष्य )
.................................................. अरुण

Saturday, August 15, 2009

दो शेर

सदियाँ गुजर चुकी हैं कुछ भी अलग नही
अब भी वही जहन है जिद्दोजहद लिये


फैली खुदाई बाहर भीतर वही खुदाई
कुछ भी जुदा नही है 'मै' के सिवा यहाँ

........................................................... अरुण

Friday, August 14, 2009

दुनियादारी

सामाजिक परिवेश में जन्म पाने के कुछ दिनों के बाद-
सर्व प्रथम - भेद का भाव
जिससे उभरे स्व एवं पर का भाव
परिणामतः जन्मे भय भाव और सुरक्षा की इच्छा
यही है सुखेच्छा, दुःख का प्रपंच लिए
दुःख से निकलने की तड़प ही
उलझाती है नए दुःख में
इसी दुष्ट चक्र को कहते हैं - संसार या
दुनियादारी
............................. अरुण

Thursday, August 13, 2009

अनुभव की लालसा

हरेक क्षण अपने आप में पूर्ण है
अनुभव की लालसा उसके पूर्णत्व को भंग कर देती है।

विचारों से विचार नही मिटते
विचारों से विचारजन्य समस्याएँ नही सुलझती
कागज पर पेन्सिल से रेखाएं बन तो सकती हैं पर
उन रेखाओं को पेन्सिल से मिटाया नही जा सकता।
.............................................................................. अरुण

Wednesday, August 12, 2009

समतल वर्तमान पर भूत भविष्य का भ्रम

कागज पर रेखाओं और शेडिंग द्वारा ऊँची नीची घाटियाँ रेखांकित की जाती हैं। कागज का धरातल समतल होते हुए भी उसपर ऊंचाई एवं गहराई जैसे आयामों का भ्रम पैदा कर दिया जाता है।
अस्तित्व में केवल वर्त्तमान ही है, परन्तु मस्तिष्क में, स्मृति रेखाओं के सहारे भूत एवं भविष्य काल का भ्रम निर्मित होता है। इसतरह, समय या काल का काल्पनिक आयाम वास्तव जान पड़ता है। वर्तमान में ही अतीत एवं भविष्य का स्पर्श है।
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Sunday, August 9, 2009

कल आज और कल

नामुरादी में यादे कल
तमन्ना में कल का कल
आज है इक रास्ता
गुजरे है कल से कल
..........................अरुण

Saturday, August 8, 2009

आज का दोहा ...

जीते जी मै खो गया दुनियादारी खींच।
एक गुफा फैली रही, जनम मरण के बीच।।

जनम के साथ ही साथ नींद (गुफा) की प्रक्रिया शुरू हो गई। पृथ्वी और आकाश के बीच रहते हुए भी उसकी ओर से ध्यान हटने लगा। प्रकृति से हटकर संस्कृति द्वारा ढलने लगे। समाज नाम का एक रोग संक्रमित हुआ। सामाजिक संवाद की भाषा मिली। तरीका मिला समाज में रहने का। रिश्ते बने अपने पराये के। प्रेम करना सीखा अपनो के साथ व बैर पालना सीखा परायों के विरूद्व। संगठन के नाम पर अलगाव सीखा। जो वैश्विक है उसे देश-परदेश, घर-द्वार, जात-परजात में बांटना सीखा। परम-प्राण के टुकडे हुए और इन टुकडों के सहारे जीना सीखा। परम शान्ति भंग हुई और दौड़ शुरू हुई मन की शान्ति, घर की शान्ति, नगर की शान्ति, देश और विश्व-शान्ति के पीछे।
जीवन टूटा और उसके टुकडों को जीवित रखने हेतु संघर्ष शुरू हुआ। जहाँ संघर्ष वहां भय, वहां चिंता। जहाँ भय वहां स्वप्न, वहां मोह सुख का तथा साथ ही आशंका दुःख की। इसतरह प्रकृति से नाता टूटा और हम भी टूटे भीतर-बाहर। नींदमयी जीवन की धार पर बहते हुए खो गए, जागृत-जीवन से कोसो दूर।
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Friday, August 7, 2009

कुछ शेर .......

'जो भी है ' देखना है
खुदा कहूँ न कहूँ मर्जी अपनी

जानना तो कुछ भी नही है यारों
'जानने वाले' को ही जानो, जानना क्या है?

दुनिया में जितने बन्दे उतने ही होते आलम
जिसमें सभी समाये खोजूं वही मै आलम
................................................................... अरुण

Thursday, August 6, 2009

कुछ शेर ....

आदम से न देखी शक्ल आदमी ने अपनी
अपने अक्स से काम चला लेता है

चार्चाए रोशनी कुछ काम का नही
दरवाजा खुला हो यही काफी है

बंद आँखों में अँधेरा, खुलते ही सबेरा
न फासला कुई मिटाना है
.......................................................... अरुण

Tuesday, August 4, 2009

कुछ शेर .....

मिल जाना समंदर में लहर की इशरत
'आगे क्या?'- पूछने को कौन बचे

मुक्ति की बात से तो मतलब नही अभी
बंधन का बंध समझा, बस बात ये बहोत

न उम्मीद कुई और न मै हारा हूँ
पल पल की जिंदगी से वास्ता है मेरा
.................................................................... अरुण

Sunday, August 2, 2009

प्रपंच मन में है, ध्यान में नही

सिनेमा हाल में मूव्ही चल रही है। बालकनी के ऊपर कहीं एक झरोखा है जहाँ से प्रकाश का फोकस सामने के परदे पर गिरते ही चित्र चल पड़ता है, हिलती डोलती प्रतिमाओं को सजीव बना देता है। हमें इन चल- चित्रों में कोई स्टोरी दिख रही है। हम उस स्टोरी में रमें हुए हैं।
परन्तु जैसे ही ध्यान, झरोखे से आते प्रकाश के फोकस पर स्थिर हुआ, सारी स्टोरी खो गई। केवल प्रकाश ही प्रकाश , न कोई स्टोरी है, न कोई चरित्र है, न घटना, न वेदना, न खुशी, कुछ भी नही। ये सारा प्रपंच परदे पर है, प्रकाश में नही। संसार रुपी इस खेल में भी, प्रपंच मन में है, ध्यान में नही।
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