Friday, June 30, 2017

जून २०१७ की रचनाएँ

मुक्तक
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मँझधार में बहता जो... जीता है वही
जो किनारे ढूँढता .. भयभीत है
तृप्ति पाकर ठहर जाने की ललक
कायरी मुर्दादिली की... रीत है
-अरुण

मुक्तक
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जबतक उबाल न आया...पानी भाप न बन पाया
बर्फ़ीला, शीतलतम कुनकुनापन..........सब बेकार
आदमी कितना भी झुके या..........उठ जाए ऊपर
भगवत्ता न जाग पाए अगर... उसका होना बेकार
-अरुण
न भला न बुरा
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न कुछ बुरा है और
न ही है कुछ भला
क्योंकि एक ही वक्त एक ही साँस
एक ही सर में
एक ही रूपरंग लिए
सबकुछ ढला.... साथ साथ
परंतु बाहर...
सामाजिकता की चौखटपर खडे पहरेदारों ने
उसे अपने मापदंडों से बाँट दिया

कुछ को ‘भला’ कहकर पुकारा
तो कुछ पर ‘बुरे’ का लेबल चिपका दिया
-अरुण
कर्ता-धर्ता
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घर की छत से होकर बह रही तेज हवा...
सामने मैदान में खड़े पेड़ों को हिलाडुला रही है
घर को लगे कि पेडों का हिलनाडुलना
है उसीका कर्तब

देह की छत... यानि सर..
जहाँसे होकर गुज़र रहा है विचारों का तूफ़ान
और जिसके बलपर हो रहे सारे काम....
देह को लगे कि वही है इन कामों का
कर्ता-धर्ता
-अरुण
तीनों अलग अलग
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तमन्ना.....बेइख्तियार हुई जाती है
मगर बदनाम हुआ जाता है दिल..बेजा

जबभी की....कौम की तारीफ तो बढ़ी इस्मत
ख़ुद की जरासी क्या कर दी....मिली रुसवाई

है यह इल्म कि नापाक इरादे हैं....फिरभी
जी लेता हूँ मै यहाँ.......दुनिया के बदस्तूर

-अरुण

निर्भय छलाँग
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भीतर गये बग़ैर......... नही जो दिखता
बाहर की चौकसी न........ काम आती है
डरे डरे का तैरना भी... तो ऊपर ऊपर
सिर्फ निर्भय छलाँग सच को जान पाती है
-अरुण
मनु का भ्रमजाला
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भरम के हांथों ने...... है भरम जो फैलाया
भरम की आँखों को वो असल नजर आया
इसीतरह से बनी है..... मनु की दुनिया यह
खुदा की नगरी है और मनु का भ्रमजाला
-अरुण

मुक्तक
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पल पल जानते रहना....
यानि आँख-कान-गंध-स्वाद और स्पर्श की
संवेदनापर बहते रहना ही
जीवन के मुख्यप्रवाह को जानते रहना है

किसी निष्कर्ष, सिद्धांत या
संकल्पना की गाँठ से
संवेदनाओं को कसकर उन्हें समझना....
घाट पर बैठे बैठे नदी के प्रवाह में
तैरने की कोशिश करने जैसा है
-अरुण

मुक्तक
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एक पकड़ो तो........ दूसरा छूट जाता है
छूटा वही बेहतर था....... ख़्याल आता है
खुलते तो खुलते हज़ारों रास्ते साथ साथ
चुनने की परेशानी में ही चलना रुक जाता है
-अरुण

मुक्तक
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प्रभु है और वहींपर है............. प्रभु का प्यारा भी
सिर्फ आसमां खड़ा है बीच......काले घने बादल हैं
ह्रदय की आँखों को बादलों की अड़चन कहाँ ?
तर्कवाले ही खोजते रहें क्योंकि... आँखों से घायल हैं
-अरुण
मुक्तक
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ह्रदय-तल से हार जिसने मान ली
उसमें ‘उसको’ जीत सकने की वजह
अपनी ताक़त का जरासा भी भरोसा
'उससे’ कोसो दूर रहने की वजह
-अरुण

बिगड़ी हुई दृष्टि
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देखने का यंत्र यदि
गलत ढंग से पकडा जाए
सही आँखों को भी जो दिखेगा
गलत दिखेगा

समाज के लिए जो तरीक़ा ठीक हो
समाज उसी तरीके से बालक के मस्तिष्क में
देखने की आदत बो देता है
और तब से ही आदमी की
आँखों को जो भी दिख रहा है
गलत ही दिखता रहा है

जीवनपर मुक्त एवं स्पष्ट चिंतन ही
इस बिगड़ी हुई दृष्टि को पुन: ठीक करने की
संभावना रखता है
ऐसा चिंतन अनायास ही फलता है
किसी अभ्यास या प्रयास से नही
-अरुण
मूलभाव
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“तुम उस कुम्हार के बर्तन हो
मै इस कुम्हार की रचना
तुम उसके चाक पे ढल आये
मै इसके चाक की घटना
तुम भी मिट्टी मै भी मिट्टी
एकही भूमि अपनी”

ऐसे मूलभाववाले बर्तन
पता नही कैसे?.. बादमें
अपना पात्रता-धर्म छोड़कर
शत्रुता-धर्म अपनाते हैं और
आपस में टकराकर टूट जाते हैं
-अरुण

मुक्तक
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परम से टूटना ही असल में........ रोग है
उससे छूटने का दु:ख ही तो.......वियोग है
इसी रोग ओ दु:ख को धूमिल करता विषयानंद
परमानंद तो तभी जब...... परम से योग है
-अरुण

मुक्तक
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जगत के अस्तित्व में
अपने भिन्नत्व का
हो जिसे आभास
उसे न होता क्षण को भी
सकल जगत एहसास

सकल जगत एहसास ही
साँस सबन की होवे
उसी साँस की धरतीपर
हरकुई निज-स्वर बोवे

जिसके उतरा ध्यान में
यह सत उसका का सार
दुनिया के जंजाल में
वह भव-सागर पार
-अरुण

शायद किसी ने कहा है
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जिधर हो बहाव तेरा
वहीं से बहना
जीवन को अपने स्वभाव से
बहने देना
परम-समाधान के सागर में
पहुँचना है तो
पूरब को चलूँ या पश्चिम को
इस सवाल में मत पड़ना
- अरुण

पाप-निष्पाप
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जिसके हाँथों पाप घटना संभव नही
वह साधु है
जिसकी समझ और होश उसे पाप करने नही देती
वह सत्चरित्र है
जो पाप करने से डरे
वह पापभीरु क़िस्म का पापी है
जिसके हाँथों अनजाने में पाप घटता हो  
वह निष्पाप है
अपने को सत्चरित्र कहलाने के लिए जो चुनिंदा आचरण करे
वह ढोंगी है
और जो जानबूझकर पाप कर रहा हो
वह है पाप का सौदागर
-अरुण
कल किसी को कहते सुना कि
*********************
हवा का गुबारा है
हममें से हर कोई

गुबारे की ऊपरी परत को
समझ लेते
हम अपनी अलग पहचान

परत को तोडे बिना ही
जागकर...जान सकता है
हम में से हर कोई कि
यह सब खेल है हवा का

हवा जो केवल हवा है
न तेरी है न मेरी और न ही सबकी
-अरुण

योगिता Vs उपयोगिता
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खोजते ही रहना और
हर वक्त
नये नये सवालों के हाँथ पकड
उनकी गहराई में
खोज को उतारते रहना ही
फ़ितरत है आदमी के
सहज स्वाभाविक प्रज्ञा की

छोटे बालकों द्वारा पूछेजानेवाले
प्रश्नों के माध्यम से
ऐसी जीवंत प्रज्ञा प्रगट होती रहती है

जैसे ही ‘उपयोगिता’ का पहलू
जीवंत प्रज्ञा को छू जाता है
प्रज्ञा गूढ प्रश्नों का सामना करना छोड
मूढ़ सवालों में ही उलझ जाती है

इन मूढ सवालों के हल भले ही
आदमी के जीवन में उपयोगी रहे हों
आदमी अपनी ‘योगिता’ को
(सृष्टि से जुड़ाव)
भूलकर ‘उपयोगिता’ के ही रास्तेपर चल पड़ा है
अब आदमी खुश तो हो जाता है
परंतु समाधानी नही
-अरुण
सूर्यवत प्रकाश ही प्रकाश
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आनंद ही आनंद है सिर्फ
कौन है आनंदित  यह पूछना सही नही
क्योंकि आनंद का कोई उपभोक्ता नही

आनंद केवल अवतरण है
उस सत स्थिती का
जहाँ कोई भी किसी को देखता नही
और न ही कुछभी किसीके द्वारा
देखा या किया जा रहा हो.....

जो भी है बस होता हुआ है
आनंद वहाँ नही जहाँ कुछ हो गया
बन गया.. दिख गया हो
जीवंत वर्तमान ही है आनंद
सत-चित-आनंद
जहाँ न कोई काया है न माया
न धूप है न छाया
है केवल सूर्यवत प्रकाश ही प्रकाश
-अरुण
चित्तावस्थाएँ
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गहरी नींद होती..
होता तभी विशुद्ध मस्तिष्क
न चलता स्व का खेल.. न होता चित्त अस्वस्थ
न सपने बोलते हैं और न ही उभरते हैं विचार
शरीर विश्रांत होनेसे... हो न पाए मन-संचार

गहरी नींद टूटे.......
चित्त चलता जागरण की ओर
स्व फिर जागता है स्वप्न, चिंतन का मचे है शोर
तन तो जागता पर ...
मनस्वरूपी नींद घुस आती
तन में जागृति निखरे.. जो मन में है धुमिल होती

धुमिलता चित्त की ही आदमी को अधजगा रखे
हमेशा........जागरण की पूर्णता को अधसधा रखे
समाधी की अवस्था... जागरण की पूर्णता का रूप
जहाँपर नींद भी गहरी.. घनी हो जागरण की धूप
-अरुण
ईश्वर क्यों चाहिए ?
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बिना साफ साफ देखेसमझे
सच को सच कहना... गलत होगा
झूठ को झूठ मान लेना भी गलत होगा

कहने के लिए तो आदमी हमेशा
अच्छी बातें ही कहता रहता है....
क्योंकि यही सिखाया जाता है

ईश्वर या सत्य के बाबत
वह कहता है....
ईश्वर सर्वत्र है... क्षण क्षण में है, कण कण में है
फिर, उसे वह अपने दुश्मनों में क्यों नही देखता?
परधर्म को माननेवालों में क्यों नही देखता?
क्यों नही परदेसीयों में उसे वह दिखाई देता?

जहाँपर उसे.. ईश्वर है ऐसा लगे..
उसी के सामने वह हाँथ जोड़ता है
क्योंकि
उसे तो ईश्वर चाहिए सिर्फ हाँथ जोड़ने के लिए
जरूरत पड़े तो अपने माने हुए ईश्वर के नाम पर
बखेड़ा खड़ा करने के लिए
संकट के समय
पुकारने के लिए.. बस
-अरुण
मन
*****
मानना....
कुछ भी मानना
या मान लेने की क्रिया..जहाँ से होती है...
मन... उसी को कहते होंगे शायद

मानी हुई बातों का
जोड-घट, उनकी उथल-पुथल, उनमें वाद-संवाद
उनका काल्पनीकरण.. निष्कर्षन जो करता है..
उसीको मन कहा जाता होगा शायद

इस मन से जो भी बातें
वास्तव बनकर हमारे बीच आकर बसती हैं
और हमारे जीवन कलापों का आधार बनती हैं
उन्हे ही ‘मानसिक’ कहा जाता होगा शायद
-अरुण

मौत किसी को नहीं जानना चाहती है
******************************
ये तो याद नहीं कि
मेरे जन्म के समय मुझे मिलनेवाली जिंदगी ने
मेरा नाम पता ठिकाना मकसद और मंजिल के बारे में
मुझसे पूछा था या नहीं?
परंतु यह तो मै साफ साफ देख पा रहा हूँ कि
सामने खड़ी मौत को
इस बात में कोई रूचि नहीं है
कि  मै कौन हूँ, किस जातपात,
देश सूबा से ताल्लुक रखता हूँ,
जिंदगी में मैंने क्या कमाया या खोया हैं...
उसे तो इस बात से भी कोई सरोकार नहीं कि
मै आदमी हूँ, या कोई और प्राणी या किसी जंगल में पला पेड़ पौधा
-अरुण

आकार-बोझ से रिक्त.. सदा ही मुक्त
******************************
पिंजड़े में तोता फड़फड़ाता है मुक्ति
के लिए....पिंजड़े को कुछ भी
पता नही होता


हाँ, अगर पिंजडे को होश आ जाए और...
वह तोते की बंधन-पीडा देख ले
तो शायद...
कोई सुध ले वह तोते के दर्द की
और यह सोचने के लिए विविश हो जाए कि

अगर पूरा का पूरा आकाश गुजर जाता है उससे होकर
फिर आकाश में उड़ सकनेवाला यह तोता क्यों नही?

उसका यह मूलभूत सवाल
सबके लिए ही प्रकाश बन सकता है
इस सबक़ के साथ कि

बंधन तो आकार को होता है
आकाश को नही
जिनका चित्त किसीभी आकार-बोझ से रिक्त हो
वे सदा ही मुक्त हैं
-अरुण




आकार-बोझ से रिक्त.. सदा ही मुक्त
******************************
पिंजड़े में तोता फड़फड़ाता है मुक्ति
के लिए....पिंजड़े को कुछ भी
पता नही होता

हाँ, अगर पिंजडे को होश आ जाए और...
वह तोते की बंधन-पीडा देख ले
तो शायद...
कोई सुध ले वह तोते के दर्द की
और यह सोचने के लिए विविश हो जाए कि

अगर पूरा का पूरा आकाश गुजर जाता है उससे होकर
फिर आकाश में उड़ सकनेवाला यह तोता क्यों नही?

उसका यह मूलभूत सवाल
सबके लिए ही प्रकाश बन सकता है
इस सबक़ के साथ कि

बंधन तो आकार को होता है
आकाश को नही
जिनका चित्त किसीभी आकार-बोझ से रिक्त हो
वे सदा ही मुक्त हैं
-अरुण

मुक्तक
*******
सपने ही जिन्हें सच्चे लगते हैं
उनसे कहते रहना कि
“आप सपने देख रहे हो.. सच्चाई नही”
किसी काम का नही

उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए.. उनके साथ रहते हुए
जो उपाय उन्हे नींद से पूरी तरह जगा देंगे
वही उपाय काम आएँगे

पूरी तरह जागकर ही कोई जान सकता है कि
वह सपने देख रहा था.... सच्चाई नही
-अरुण















































 




















 








Saturday, June 17, 2017

मई २०१७ की रचनाएँ

मई २०१७ की रचनाएँ
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रुबाई
*****
यह जीवन सूरज की उर्जा है...गलत नही
यह जीवन धरती का है सार.. गलत नही
चलती
साँस, बहती हवा और सारा आकाश
यही तो है जीवन, यही है संसार….गलत नही
-अरुण
जिंदगी ही जीती है उसमें .....
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बंदा किये जाता है.. अपने को ‘करनेवाला’ समझ
दरअसल खुद ही किया जाता है वह.....न पता उसको
लगे उसे कि वह जीता जिंदगी को अपने ढंग से
दरअसल, जिंदगी ही जीती है उसमें... न पता उसको
-अरुण
सामान ज़रूरी
——————
जीने के लिए होता है............. सामान ज़रूरी
सामान की हिफाजत का......... सामान ज़रूरी
बदले है जरूरत.............यूँ अपना सिलसिला
जीने से अब ज़्यादा............. सामान ज़रूरी
-अरुण
मान्यताएँ
—————
जहाँ से शुरू करो वह शुरुवात नही होती
जहांपर ख़त्म करो वह अंत नही होता
आरंभ और अंत तो केवल हैं मान्यताएँ
जो मान लिया जाए वह सच नही होता
-अरुण
शब्दों में स्थिरा दिया गया
*********************
कालप्रवाह को ‘समय’ नामक खाँचे में जमा दिया गया
बहते जलकणों को... ‘नदी’ नामक वस्तु बना दिया गया
वैसे तो हर पदार्थ, वस्तु, स्थिति गतिमान ही है फिर भी,
शब्दों में उन्हे किसी न किसी........ स्थिरा दिया गया
-अरुण

रुबाई
*****
रात हि होवे दिन नही.. यह कैसे संभव है?
पश्चिम के बिन पूरब होवे.. कैसे संभव है?
पूरी पूरी सच्चाई ही............सच्चाई होवे
साँस अधुरी लेकर जीना..... कैसे संभव है?
-अरुण

रुबाई १
*******
हकीकत को नजरअंदाज करना ही नशा है
असल में होश खोता आदमी ही….दुर्दशा है
तरीके मानसिक सब,…होश खोने के यहांपर
कोई साधन मिले.....बेहोश होना ही नशा है
– अरुण
रुबाई २
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बैसाखी के बल पर ही लंगडा चलता है
किसीका कंधा पकड अंधा आगे बढ़ता है
होश को तो चलना ही न पड़े, क्योंकि वह
जागी निगाहोंसे ही अंतर तय करता है
– अरुण
रुबाई
*******
ये बस्ती, ये जमघट,..हैं सुनसान मेले
सभी रह रहे साथ.......फिर भी अकेले
जुड़े दिख रहे…..........बाहरी आवरण ही
सभी के......ह्रदय-धाग …. ……टूटे उधेडे
– अरुण

रुबाई
*******
ज़र्रा ज़र्रा है जुदा ना मलकियत उनकी अलग
फिर करोड़ों में मेरी यह शख़्सियत कैसे अलग?
यह उतारा दिल में जिसने सच्चा बुनियादी सवाल
देखता ख़ुद में खुदाई....... ना खुदा जिससे अलग
– अरुण
रुबाई
*****
पेड पर जड़े हुए फल कभीभी खरे नही होते
जड़ से जुड़े फल कभीभी दिखावे के नही होते
जान से नही.... परंतु मन से केवल जानते जो
होते जानकारी के धनी वे...जीवन-धनी नही होते
-अरुण

यादें
******
आतीं तो हैं पर ठहरती नही यादें
न जगह बनाती.....
न जगह घेरती हैं यादें
फिर भी लगता है कि
मन में एक बड़ा फैलाव है यादों का
जन्म से अबतक जीवित है
एक पड़ाव है यादों का

याद से नयी याद झलकते ही
पुरानी खो जाती है ख़ुद में ही.....बिना देखे अपना विसर्जन
और समझती है कि जैसे किसी अखंड प्रवाह का
हो रहा हो सर्जन..... भीतर ही भीतर

इस प्रवाह भ्रम में ही
प्रतिबिंबित होता है
विचारों और प्रतिमाओं का संचरण उस नदी जैसा
जो अपने से ही निकलती, अपने में ही बहती और
समा जाती अपने में ही...... बिना छोड़े कोई भी सबूत अपना

यादें.... होते हुए भी नही होतीं
पर भर देती है आदमी में जीव
ख़ुद रहते हुए निर्जीव
-अरुण










हो रहा अपने आप से
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अहंकार को कर्म का सुख है
तो प्रारब्ध की चिंता भी
पुराने कृत्यों का
हिसाब चुकाना पड़ेगा
यह भय भी

जिसमें न रहा अहंकार
न बचा कोई कर्ताभाव...
उसे न रहा कोई लगाव
न ही पुण्य से
और न ही पाप से

क्योंकि वह सदैव विश्रांत है
इस धुन में
कि जो भी हो रहा यहाँ..
हो रहा अपने आप से
-अरुण


नीति बनाम धर्म
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कृत्य अच्छा था या बुरा...
नीति का है यह विषय
कृत्य के पीछे छुपा भाव... शुद्ध ही हो...
यही है धर्म का आशय
-अरुण
क्षण की गली
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क्षण की गली है बहुत ही संकरी
या तो तुम ठहरो यहाँ
या उसे ही रहने दो
ठहरने दो यहां बोध को
या बुद्धि को ही चलने दो

दोनों को समां ले ऐसी इसमें जगह नही
वर्तमान ही ठहर पाए यहाँ...है यह उसीका घर
न है यहाँ कोई बीता.. न आता प्रहर
और न ही कोई दोपहर
-अरुण

सुख में सुमिरन...
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दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय- कबीरदासजी
--------------
जो सुख में सुमिरन करे..... वो तो बुधसम होय.....
क्योंकि ऐसे बुद्धसम सत्य-जिज्ञासियों का चित्त तो
सुख और दुख... दोनों के ही परे होता होगा।
-अरुण




समझने के दो तरीके
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किसी भी बात को समझने के दो तरीके हैं
एक है.. उस बात के बारे में जानना और
दूसरा है... उस बात को जीना
जानना.... काम है मन, बुद्धि और स्मृति का
और जीना..... काम है ह्रदय की अवधानता का
जानना.... जानते हुए भी न जानने के बराबर है
और जीना.... न जानते हुए भी पूरीतरह जान लेने के बराबर

आध्यात्म .... जानने की वस्तु नही
जीने का वास्तव है
-अरुण  
एक शेर
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तफ़सील पे तफ़सील की प्यासे को क्या गरज
प्यासे को कत्रा दरिया का.. दरिया सा लग रहा
-अरुण
कहाँ है हमारा आज?
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हमारा बीता कल ही
आज का चेहरा पहनके जीता है
और आनेवाले कल पर
अपनी आँखें टिकाये रहता है
-अरुण
दोनों ही हैं अनजान
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बंदा खुद से ही बड़बड़ाता है
अपनी ही कही बात को सुनता है
बाहर से आतेजाते एहसासों से
अपने भीतर
नये नये ख्यालात ओ जज़्बात
बुनता है

इसतरह बंदा जो भी करे ...
‘वह’ अनजान है
और ‘वह’ जो भी करे उससे
बंदा अनजान है
इस माने में... दोनों ही हैं अनजान
-अरुण



रंगीनीयत और पानीपन
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संस्कारों से नहीं बदलता ख़ून ओ बदन का रंग
हाँ, बदलता है आदमी के जीने का ढंग केवल
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पानी में जब घुल जाते हैं रंग कई..
रंगीनीयत को पानी नज़र नही आता..
पानीपन मगर बरक़रार रहे जल का..
पानीपन पर कोई भी रंग चढ नही पाता..
-अरुण

आत्मघात... आत्मसमर्पण
*********************
अतिनिराश हुआ अहंकार प्रवृत्त होता है
आत्मघात के लिए
अपनी उपद्रवक्षमता से जो अहंकार घनापरिचित हो जाए
वही सहज प्रवृत्त होता होगा
आत्मसमर्पण के लिए
-अरुण