Saturday, June 17, 2017

मई २०१७ की रचनाएँ

मई २०१७ की रचनाएँ
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रुबाई
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यह जीवन सूरज की उर्जा है...गलत नही
यह जीवन धरती का है सार.. गलत नही
चलती
साँस, बहती हवा और सारा आकाश
यही तो है जीवन, यही है संसार….गलत नही
-अरुण
जिंदगी ही जीती है उसमें .....
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बंदा किये जाता है.. अपने को ‘करनेवाला’ समझ
दरअसल खुद ही किया जाता है वह.....न पता उसको
लगे उसे कि वह जीता जिंदगी को अपने ढंग से
दरअसल, जिंदगी ही जीती है उसमें... न पता उसको
-अरुण
सामान ज़रूरी
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जीने के लिए होता है............. सामान ज़रूरी
सामान की हिफाजत का......... सामान ज़रूरी
बदले है जरूरत.............यूँ अपना सिलसिला
जीने से अब ज़्यादा............. सामान ज़रूरी
-अरुण
मान्यताएँ
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जहाँ से शुरू करो वह शुरुवात नही होती
जहांपर ख़त्म करो वह अंत नही होता
आरंभ और अंत तो केवल हैं मान्यताएँ
जो मान लिया जाए वह सच नही होता
-अरुण
शब्दों में स्थिरा दिया गया
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कालप्रवाह को ‘समय’ नामक खाँचे में जमा दिया गया
बहते जलकणों को... ‘नदी’ नामक वस्तु बना दिया गया
वैसे तो हर पदार्थ, वस्तु, स्थिति गतिमान ही है फिर भी,
शब्दों में उन्हे किसी न किसी........ स्थिरा दिया गया
-अरुण

रुबाई
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रात हि होवे दिन नही.. यह कैसे संभव है?
पश्चिम के बिन पूरब होवे.. कैसे संभव है?
पूरी पूरी सच्चाई ही............सच्चाई होवे
साँस अधुरी लेकर जीना..... कैसे संभव है?
-अरुण

रुबाई १
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हकीकत को नजरअंदाज करना ही नशा है
असल में होश खोता आदमी ही….दुर्दशा है
तरीके मानसिक सब,…होश खोने के यहांपर
कोई साधन मिले.....बेहोश होना ही नशा है
– अरुण
रुबाई २
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बैसाखी के बल पर ही लंगडा चलता है
किसीका कंधा पकड अंधा आगे बढ़ता है
होश को तो चलना ही न पड़े, क्योंकि वह
जागी निगाहोंसे ही अंतर तय करता है
– अरुण
रुबाई
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ये बस्ती, ये जमघट,..हैं सुनसान मेले
सभी रह रहे साथ.......फिर भी अकेले
जुड़े दिख रहे…..........बाहरी आवरण ही
सभी के......ह्रदय-धाग …. ……टूटे उधेडे
– अरुण

रुबाई
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ज़र्रा ज़र्रा है जुदा ना मलकियत उनकी अलग
फिर करोड़ों में मेरी यह शख़्सियत कैसे अलग?
यह उतारा दिल में जिसने सच्चा बुनियादी सवाल
देखता ख़ुद में खुदाई....... ना खुदा जिससे अलग
– अरुण
रुबाई
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पेड पर जड़े हुए फल कभीभी खरे नही होते
जड़ से जुड़े फल कभीभी दिखावे के नही होते
जान से नही.... परंतु मन से केवल जानते जो
होते जानकारी के धनी वे...जीवन-धनी नही होते
-अरुण

यादें
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आतीं तो हैं पर ठहरती नही यादें
न जगह बनाती.....
न जगह घेरती हैं यादें
फिर भी लगता है कि
मन में एक बड़ा फैलाव है यादों का
जन्म से अबतक जीवित है
एक पड़ाव है यादों का

याद से नयी याद झलकते ही
पुरानी खो जाती है ख़ुद में ही.....बिना देखे अपना विसर्जन
और समझती है कि जैसे किसी अखंड प्रवाह का
हो रहा हो सर्जन..... भीतर ही भीतर

इस प्रवाह भ्रम में ही
प्रतिबिंबित होता है
विचारों और प्रतिमाओं का संचरण उस नदी जैसा
जो अपने से ही निकलती, अपने में ही बहती और
समा जाती अपने में ही...... बिना छोड़े कोई भी सबूत अपना

यादें.... होते हुए भी नही होतीं
पर भर देती है आदमी में जीव
ख़ुद रहते हुए निर्जीव
-अरुण










हो रहा अपने आप से
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अहंकार को कर्म का सुख है
तो प्रारब्ध की चिंता भी
पुराने कृत्यों का
हिसाब चुकाना पड़ेगा
यह भय भी

जिसमें न रहा अहंकार
न बचा कोई कर्ताभाव...
उसे न रहा कोई लगाव
न ही पुण्य से
और न ही पाप से

क्योंकि वह सदैव विश्रांत है
इस धुन में
कि जो भी हो रहा यहाँ..
हो रहा अपने आप से
-अरुण


नीति बनाम धर्म
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कृत्य अच्छा था या बुरा...
नीति का है यह विषय
कृत्य के पीछे छुपा भाव... शुद्ध ही हो...
यही है धर्म का आशय
-अरुण
क्षण की गली
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क्षण की गली है बहुत ही संकरी
या तो तुम ठहरो यहाँ
या उसे ही रहने दो
ठहरने दो यहां बोध को
या बुद्धि को ही चलने दो

दोनों को समां ले ऐसी इसमें जगह नही
वर्तमान ही ठहर पाए यहाँ...है यह उसीका घर
न है यहाँ कोई बीता.. न आता प्रहर
और न ही कोई दोपहर
-अरुण

सुख में सुमिरन...
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दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय- कबीरदासजी
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जो सुख में सुमिरन करे..... वो तो बुधसम होय.....
क्योंकि ऐसे बुद्धसम सत्य-जिज्ञासियों का चित्त तो
सुख और दुख... दोनों के ही परे होता होगा।
-अरुण




समझने के दो तरीके
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किसी भी बात को समझने के दो तरीके हैं
एक है.. उस बात के बारे में जानना और
दूसरा है... उस बात को जीना
जानना.... काम है मन, बुद्धि और स्मृति का
और जीना..... काम है ह्रदय की अवधानता का
जानना.... जानते हुए भी न जानने के बराबर है
और जीना.... न जानते हुए भी पूरीतरह जान लेने के बराबर

आध्यात्म .... जानने की वस्तु नही
जीने का वास्तव है
-अरुण  
एक शेर
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तफ़सील पे तफ़सील की प्यासे को क्या गरज
प्यासे को कत्रा दरिया का.. दरिया सा लग रहा
-अरुण
कहाँ है हमारा आज?
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हमारा बीता कल ही
आज का चेहरा पहनके जीता है
और आनेवाले कल पर
अपनी आँखें टिकाये रहता है
-अरुण
दोनों ही हैं अनजान
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बंदा खुद से ही बड़बड़ाता है
अपनी ही कही बात को सुनता है
बाहर से आतेजाते एहसासों से
अपने भीतर
नये नये ख्यालात ओ जज़्बात
बुनता है

इसतरह बंदा जो भी करे ...
‘वह’ अनजान है
और ‘वह’ जो भी करे उससे
बंदा अनजान है
इस माने में... दोनों ही हैं अनजान
-अरुण



रंगीनीयत और पानीपन
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संस्कारों से नहीं बदलता ख़ून ओ बदन का रंग
हाँ, बदलता है आदमी के जीने का ढंग केवल
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पानी में जब घुल जाते हैं रंग कई..
रंगीनीयत को पानी नज़र नही आता..
पानीपन मगर बरक़रार रहे जल का..
पानीपन पर कोई भी रंग चढ नही पाता..
-अरुण

आत्मघात... आत्मसमर्पण
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अतिनिराश हुआ अहंकार प्रवृत्त होता है
आत्मघात के लिए
अपनी उपद्रवक्षमता से जो अहंकार घनापरिचित हो जाए
वही सहज प्रवृत्त होता होगा
आत्मसमर्पण के लिए
-अरुण

















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