Monday, September 28, 2015

५० पेज तक का संकलन

सच्ची बात
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कोई तो क़रीबी होते हैं......कोई तो पराये होते हैं
ऐसे भी कई रिश्ते जोके  शिद्दत से भुलाये होते हैं
अरुण
सच्ची बात
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हर जगत की सहुलियत को रच दिया है सोच ने
सहुलियत ने सोचने की...रच दिया ईश्वर सहज
अरुण
सच्ची बात
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आदमी है जब..... आदमी से ही डरा हुआ
फिर अमन-ओ-चैन कहां और किधर से आएगा ?
अरुण
सच्ची बात
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इशारे करने वालों से न नजरें जोड़ के रखना
इशारा जिस तरफ़ हो उस तरफ़ ही देखना वाजिब
अरुण
सच्ची बातें
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रौशनी हो तो नज़ारा साफ़ दिखता है,
बात सही है पर....
न रौशनी न नजारा.. एक दूसरे पे निर्भर है
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भगवान रौशनी है ........ऐसी प्रखर प्रगाढ़
जिसमें सभी उजागर हैं दिल के कारोबार
अरुण
सच्ची बात
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शख़्स में हर- 'मै अलग हूँ' - ख़्याल आया
जहनियत हिलने लगी भूचाल आया
अरुण
सच्ची बात
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हज़ारों क़ायदे आये अमन-ओ-चैन के ख़ातिर
न होगा कुछ असर.....हर ज़हन में ही जंग जारी है
अरुण

सच्ची बात
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क़ुदरत को क्या पता हो... के उसका क्या वजूद
जिसमें वजूद जागा वह  क़ुदरती नही
अरुण

सच्ची बात
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ना जुडा मस्तिष्क से मन...
भिन्न दो बातें
'मै' नही होता तभी....
 यह समझ आए
अरुण

सच्ची बात
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मन तो कहता आ रहा यह जिस्म उसका ही हुआ
जिस्म का कोई नही इस जिस्म की मर्ज़ी सिवा
अरुण
सच्ची बात
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क़ुदरत को जो मिली है......वैसी निगाह दे दो
फिर देखना ही होगा सिरफ.......खोजना नही
- अरुण

सच्ची बात
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गली बाज़ार कूचे में जिसे मै ढूँढता था....घर से निकल
निकल आया के  मेरा  घर ही था वो, जहाँ मै रह रहा था
अरुण

सच्ची बातें
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छांव में छुपकर रहे.... ..होवे उजागर धूप में
छांव हो के धूप हो, सच हर जगह हर रूप में
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अधजगा हूँ, सोचता या देखता सपना कोई ?
मुझ सवाली को जगा दे नींद से पूरा कोई
- अरुण


सच्ची बात
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सूरज चमक रहा जब, तारे नज़र न आये
बुद्धों की आँख में तो दोनों सहज समाये
अरुण
सच्ची बात
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न उनमें डूबकर और न ही उनसे भागकर.....
सांस लेनी है....बवालों झंझटों के बीच रहकर
अरुण

सच्ची बात
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राह चुनने की लगन थी.....हौसला था
पर न थी मंजिल कोई ना फासला था
अरुण

सच्ची बात
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हर मंजिल कोशिश के चलते पायी जाती है
इक ऐसी भी, कोशिश के थमते... पास चली आती
अरुण
सच्ची बात
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चेहरे देखकर ही दिल से दिल जुड़ते नही हैं
फकत पढ़ शब्द गीता के प्रभु मिलते नही हैं
अरुण






















कुछ छुपी-खुली बातें
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नदी पे थिरकते हुए पानी को.... है कौन रोक पाए
ख़ुद रुकना.. रोके रखना, ये इल्म... हवा से सीखें
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आकाश ने कहा .....
आओ मेरी चादर को ओढ़कर उड़ते रहो....
परंतु अपनी मैली फटी पुरानी चादर लपेटे हुए ही
आकाश के सपने देखता रहा है.. इंसान







एक ही रखता क़दम  हर बार वो
सोचता रहता जो...मीलों दूर की
जिस जगह बैठे नही उसकी जगह
उभर आती  मिल्कियत मगरूरस
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
बाहर न था सुकून... सो अंदर निकल गया
अंदर वही थी भीड जिसे टालता था मै
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
क़दम बढ़ा तो घटा फ़ासला क़दम भर का
मिला तो कुछ भी नही हो गई कवायत बस
अरुण

जहाँ से देखता हूँ आदमी को
आदमी के नक़्श  के
परचम बदलते जान पड़ते हैं
कभी लगता तरक़्क़ी कर रही
है क़िस्म इक सब प्राणियों के बीच
कभी दिखता कि अपनी आँख पे पट्टी
लगाकर गुनहगारी कर रहा है आदमी
कभी हल जोतकर है

एक प्रासंगिक शेर (हिंदी)
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जब तक न कर सको तुम दुश्मन का रंग फीका
अच्छाइयाँ जो तुझमें ........रौशन न हो सकेंगी
अरुण




28-5-2015

आज के लिए चार शेर
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इक दबोचे एक भागे आसमां में सब उड़ें
है खुलापन आसमां यह, आसमां में सब जिएँ

तुमने तोहफ़ा दे दिया जो उसने झुककर ले लिया
क्यों दिए.. वह क्यों झुका, ये बात कहने की नही

बयां करने से तकलीफें घनी मज़बूत होती हैं
चुभन को देखते गहिरे चुभन का दम निकलता है

शिकायत ये कि हर मसले को वो पूरा निगल जाए
उसे मालूम ........हर मसले के भीतर हैं कई मसले

अरुण

































दोन शेर व त्यांचा मराठी आशय
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नज़र के दायरे में ...जो भी आते एक हैं
नज़र गर आसमां हो, रात दिन सब एक हैं

आशय-
दृष्टी जेवढी व्यापक मनातला अभेद किंवा समत्व भाव ही तेवढाच मोठा. आकाशा साठी दिवस आणि रात्र एकच असतात. आकाशा च्या नजरेत एकाच वेळी दोन्ही घटना एकत्वाने घडत असतात.
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मंझधार तक  पहुंचकर स्वयं को भूल जाना
आसां नही है ............खुदा से रूबरू होना

आशय-
सत्य किंवा देव किंवा परम रहस्या चे दर्शन घेणे सोपे नाही..... नदी च्या अति वेगवान मध्यधारेत पोहचून त्या धारेत स्वत:ला मिसळून टाकण्या सारखी साहसी कृती आहे ही.
- अरुण







हर कोई आइने के सामने, हटना नही चाहता
जहाँ भी जाता उसे .......साथ साथ ले जाता

एहसास के जर्रों पे तजुर्बों की जमी धूल
जिंदगी.. खिदमत-ए- माज़ी में है मश्गूल
 - अरुण
चार शेर
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बुझाई आग तो तूफ़ाँन ने है सर उठाया
जनतंत्र है,  इन्तेखाब तक रुकना होगा
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घरबार सबकुछ छोड बैठे हो मगर, साधो !
इस बात का करते जिकर क्यों बार बार
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जब किनारे पर डला लंगर समझ से दूर हो
पतवार हो, हो हौसला किस काम के दोनों हुए
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हवा मलीन हुई...... लोग भी हुए नादां
न कुछ भी हो सके ख़ुशबू के लौट आने तक
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- अरुण


वैसे तो कई गुज़रे आँगन से मेरे - आफताब
एक सीधे उतर आया दिल में आकर बस गया
अरुण

ये है बाहर वो है भीतर, भीतर बाहर कुछ भी नही
जहाँ दीवारें खड़ी न होती भीतर बाहर कुछ भी नही
अरुण
हिंदी शेर
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वैसे तो कई गुज़रे आँगन से मेरे - आफताब
एक सीधे उतर आया दिल में आकर बस गया
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ये है बाहर वो है भीतर, भीतर बाहर कुछ भी नही
जहाँ दीवारें खड़ी न होती भीतर बाहर कुछ भी नही
अरुण
किसीपर तो भरोसा करना होगा
जो घर से आ गया हूँ निकलकर
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एक ग़लती की वजह से इतनी सारी जहमतें
बूँद ने अपने को सागर से अलहिदा कर लिया
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दूर की शुरुवात होती अपने घर से ही, मगर
घर को तो देखा नही ब्रह्मांड की बातें करें
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बिना तोड़े दिवारों को मिले मुक्ती वही  मुक्ती
"दिवारें तोड़ने का ख़्याल" भी दीवार ही तो है
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हिंदी
पूरीतरह से जानना आनंददायी
आधा-अधुरापन महज़ मन की व्यथा
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मराठी
जर उरे काही अजुन जे जाणणे आहे
जाणले ते व्यर्थ..... नुसता ताप आहे
अरुण
हिंदी
सर पे बोझ ये जो है...हज़ारों साल का है
यही कारण यहाँ जो भी मिले पहचान का है
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मराठी
जग पुराणे भेटते जावे जिथे
जन्मतो मी... पण नवा ना जन्मतो
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अरुण
हिंदी
बीज को...पेड़ बनने में...समय लगता हो, मगर
पेड के अंतस्थ झांको... बीज जिंदा है वहाँ
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मराठी
जग केंव्हाही केवळ असते, काळा ची ओळख नसते
जग म्हणजे मन नाही कि ज्याला काल-आज-उद्या असते
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- अरुण

हिंदी
ब्रह्मांड का ही जीवमय इक पिंड मानव देह भी
इस तथ्य को जो जी रहा योगी उसी को जानिए
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मराठी
भ्रम द्वैताचा लोपताच तुकड्यां चा 'योग' होतो
'योग' शब्दाचा सध्या... वेगळाच उपयोग होतो
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अरुण

हिंदी
गहरा, धूसर, फीका अंधेरा..बंद आँखों में है तीनों का बसर
रौशनी छेडती है पलकों को ..पलके हैं मगर बेख़बर बेअसर
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मराठी
कळते रात्र आणि दिवस ही दिसतो..पण सूर्य अवधाना चा उगत नाही
शहाणपण रेंगाळत राहते सभोवती पण घराच्या आंत मात्र शिरत नाही
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अरुण




६ जून २०१५
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हिंदी
ख़ुद की जगह से ही दिखे गर साफ़ सबकुछ ज़हन को
ज़हन को खोजने की, 'सोचने' की क्या ज़रूरत आ पड़े
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मराठी
अस्पष्ट अंध धुंद मन
गुदमरते भिरभिरते बावचळते
विचारा चे रूप घेऊन पळत सुटते
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अरुण




हिंदी
खोया नही कुछ भी यहाँ बंदा सिरफ भूला हुआ है
मुश्किल घनी है ये के ..भूला है यही भूला हुआ है
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मराठी
विसरलाच असता तर फक्त डोस स्मरणाचा पुरेसा होता
पण इथे दुप्पट विसर घडतो... विसरतो विसर पडल्याचे  
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अरुण

हिंदी
इधर से हो जाना वहाँ तक अगर, फिर समय चाहिए
यहाँ से यहीं तक जो मन का सफ़र, ध्यानमय चाहिए
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मराठी
पाय श्रमतात, वेळ जातो खरा... पण अंतर ही मिटतं
मनाचा प्रवास आंतल्या अांत, बाहेर कांही ही न घडतं
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अरुण
हिंदी
भीड़ में हर आदमी की दास्ताँ निजी अलग
हसना रोना एक जैसा ही मगर हर शख्स का
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मराठी
रूप रंग नाव गाव वेगळे दिसले तरी
सारखी मन वेदना संवेदना सर्वांतली
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अरुण
हिंदी
चेत धारा विश्व- मन बन बह रही है
पर हर किसी में मन बनाती उसका खास
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मराठी
चेतने चे वारे वाहे अक्ख्या मानव जगतातुन
तरी  प्रत्येकाला 'मी पणा' ची झाली बाधा
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अरुण


हिंदी
किसी ने सच देखा बोला.. तो नींद ने सुन लिया,
अब, सुना जो भी नींद ने वह, बन गया है फ़लसफ़ा
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मराठी
उघड्या डोळ्यांना सत्य दिसताच.. डोळे पुटपुटले
अन् बंद डोळ्यांनी ते ऐकताच, त्याचे शास्त्र बनले
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अरुण
हिंदी
वक़्त का हर एक ज़र्रा अंत भी शुरुआत भी है
ध्यान में ये बात आते, वक़्त मानो थम गया हो
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मराठी
अस्तित्वात नसणारा काळ....जाणीवेत येतो कसा
एक चे एक आकाश त्याचा तुकडाच दिसतो जसा
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अरुण

हिंदी
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चेतना ऊर्जा महज़.....पहचान उसपर आ बसे
पहचान की ही कोख में पहचानने वाला बसे

मराठी
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कारंजा च्या जलकण रेषांना  बाहेर चा प्रकाश ओळख देतो
ही ओळख आपल्या मनांत रुजली की कारंज जीवमय होतो
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- अरुण

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