Saturday, January 2, 2016

2 January 2016

एक शेर
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आँखें खुली हुई हैं............रौशन है रास्ता
फिर भी न कुछ भी देखूँ मन-तमस के सिवा
अरुण
एक शेर
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ढेरों किताबें पढ़ लूँ फिर भी न हो समझ
रस सत्य में नही.....बस बखान में जो है
अरुण
एक शेर
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तेरी कुछ कहूँ , कुछ आकाश की भी कहूँ
शायद ........तुम्हारे पंखों में हौसला जगे
अरुण
एक शेर
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दवा की खोज है किस काम की यारों
जहाँ बीमार ही सब रोग की जड़ है
अरुण
रुबाई
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ख़्वाबों के दीप भीतर इक रौशनीसी फैले
इस रौशनी में चलते दुनिया के सारे खेले
करवट बदलती भीतर जबभी कभी हक़ीक़त
कपती है रौशनी....उठते हैं जलजले
अरुण
एक शेर
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चढ़ाओ फूल माला कुछ भी मिलना है असंभव
चढ़ाओ 'ख़ुद' को फिर हर साँस में उसकी रवानी
अरुण
रुबाई
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दिक्कतें हल नही होतीं कभी पूरी की पूरी
प्यास मिटती ही नही कभी पूरी की पूरी
दिखानेवाले ने तो धरी सामने पूरी तस्वीर
देखनेवाले ने न देखी कभी... पूरी की पूरी
अरुण
एक शेर
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किसी और ने दिया मुझको मेरा नाम पता
बीज में अपने तलाशूँ तो असल जान सकूँ
अरुण
एक शेर
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सीखने की प्यास ही जो खींच ले जलस्रोत को
प्यास बिन जो पी रहे....पानी नही... कुछ और ही
अरुण
एक शेर
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सही हो जाओ फिर हर काम तेरा...शुभ सही होगा
अशुभ हर काम उसका...जो गलत ही रह गया भीतर
अरुण
एक शेर
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झूठ के झूठेपन को जो भी  देख सके है पूरा
हर सच की सच्चाई उसमें उतर चुकी है पूरी
अरुण

आज है ३१ दिसम्बर
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एक शेर
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आख़िरी दिन और दिन पहला न जाना जिंदगी का
सिर्फ बदले हैं कैलेंडर....... .....और पन्ने माह के
अरुण
1-1-2016
V एक शेर
एक शेर
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कपड़ों से मै ढका क्या.. कपड़ा ही बन गया
कपड़े ही बन गये.......मेरी पहचान के सहारे
- अरुण

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