Friday, October 29, 2010

जो जैसा है वैसा ही देखना

राह चलता यात्री जो दृश्य जैसा है

वैसा ही देखे तो उसे नदी नदी जैसी, पर्वत पर्वत जैसा,

चन्द्र- चंद्र की तरह और सूर्य में-

सूर्य ही दिखाई देगा

परन्तु यदि दृश्य पर

पूर्वानुभवों, पूर्व-कल्पनाओं और

पूर्व-धारणाओं का साया चढाकर

यात्रा शुरू हो तो शायद

नदी लुभावनी परन्तु पर्वत डरावना लगे

चंद्र में प्रेमी की याद तो सूर्य में

आग का भय छुपा दिख जाए

सारी सीधी सरल यात्रा

भावनाओं और प्रतिक्रियाओं से बोझिल बन जाए

................................................................ अरुण

3 comments:

Vandana ! ! ! said...

अब जीवन यात्रा सरल हो जाये तो अच्छी भी नहीं लगती न! परन्तु हम अपने नकारात्मक भावनाओं पर काबू रख के इस यात्रा को कुछ हल्का बना ले तो यात्रा सुखमय रहेगी.

संजय भास्कर said...

सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !

संजय भास्कर said...

http://www.sahityapremisangh.com/2011/07/blog-post_9187.html

arun ji aapki rachna yahan pot hai hai humne........

regrds
Sanjay bhaskar