Wednesday, March 18, 2015

तीन रुबाईयां

रुबाई १
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हकीकत को  नजरअंदाज करना ही नशा है
असल में होश खोता आदमी ही....दुर्दशा है
तरीके मानसिक सब,...होश खोने के यहांपर
ललक भी कम नही, बेहोश होना ही नशा है
- अरुण
रुबाई २
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बैसाखी के बल लँगड़ा ...चल पाता है
अंधा हर हांथ का भरोसा..कर लेता है
होश को चलना नही होता..ये अच्छा है
बिन चले जागी निगाहों से पहुँच जाता है
- अरुण
रुबाई ३
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ये बस्ती ये जमघट हैं सुनसान मेले
सभी रह रहे साथ.. फिर भी अकेले
जुड़े दिख रहे.....बाहरी आवरण ही
परंतु..ह्रदय धाग .... ......टूटे उधेडे

- अरुण

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