Tuesday, December 1, 2015

१ दिसम्बर

एक शेर
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पल पल बदलती है.. ये कायनात....अपना पैतरा
मेरी मन दौड़ इस बदलाव से रखती मुझे गाफ़िल
अरुण

इसपर ग़ौर करें
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लगाव भी है अलगाव भी है एक ही वक़्त
अभाव भी है और भाव भी है एक ही वक़्त
मगर इंसान को.... इसका न कोई होश है
वह अच्छा और बीमार भी है एक ही वक़्त
अरुण

एक शेर
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यादों को ही भूत कहो........कहो भूत को याद
याद बनी है जीवन सबका.. भूत जगत अवतार
अरुण

एक शेर
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हवा पे उड़ रहे बादल को.... कुछ भी है नहीं कहना
मगर उसमें भी अपने मन मुताबिक़ चित्र देखे आदमी
अरुण
एक शेर
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साँस के चलने से पहले जो जैसा था
वैसी ही है दुनिया साँस के चलते भी
अरुण


मुहब्बत क्या है?
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मुहब्बत ऐसी नजदीकी का नाम है
जिसमें न दूरी है, न मजबूरी है,
न मिलकियत है और न है कोई नीयत...  
जिसमें दो नहीं होते और
न ही गिना जा सके
ऐसा कोई एक ही होता है...
मुहब्बत में न कोई लगाव है
और न ही कोई अलगाव,
न कोई उलझाव
और न ही है कोई सुलझाव
केवल होता है
भाव ही भाव
-अरुण  







दो बातें
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मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती
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फ़िल्म के इस गीत में गीतकार ने प्रेम-भाव को
बखूबी अभिव्यक्त किया है,
दरअसल, दिल की धडकनों को....धड़कने ही समझ पातीं हैं.
समझने का काम भले ही मन-बुद्धि करते हों... पर वे
धडकनों को महसूस करने और उन्हें समझने में असमर्थ हैं,
ठीक वैसे ही जैसे कान..... सामने धरी चीज को देख नहीं पाते
-अरुण

मन के अंदर ही है
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क्यों न हों  समंदर में हज़ारों लहरें ?
हर लहर तो समंदर ही है....
जो गिनने बैठ गया- लहरों को..
वह समंदर के साथ नही..मन के अंदर ही है
अरुण
एक शेर
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ज़मीं पे छा के भी छाया ज़मीं को कुछ नही करती
मगर इंसान का मन.......खोपड़ी को है हिला देता
- अरुण

एक शेर
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युग युगों शिक्षा प्रणाली है अजब ही किस्म की
ना जगाये प्यास... केवल जल पिलाये जा रही
अरुण
एक शेर
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आँख का है काम केवल देखना ही देखना
पहचानने का काम मन का भूत करता है
अरुण
एक शेर
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चल रहा था...रुक गया.. .........थककर नही
हर क़दम अपनी जगह पे ही चले..यह देखकर
अरुण

एक शेर
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मस्तिष्क ही निहारे भीतर बाहर
आँख तो है महज़ एक झरोखा
अरुण
एक शेर
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बिंदु का होता नही आकार, फिर भी
चित्र दिखता बिंदुओं को जोड़ते ही
अरुण
एक शेर
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आँखे पुरानी हो चुकी अब कुछ नया दिखना कहां
जब तक नया बन जी न लूँ.....होगा नया कैसे जहां
अरुण

एक शेर
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हर रवैये में छुपा हो अहं जबतक
नम्रता भी खिल पडेगी अकड़ साधे
- अरुण
एक शेर
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रौशनी को छेककर... जो भी खड़ा हो
लाख चाहे.. छांव उससे हट नही सकती
अरुण
एक शेर
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खाद की दुर्गंध ने ही फूल में ख़ुशबू जगायी
जो बुरा होता वही... अच्छा बनाया जा सके
- अरुण

एक अवलोकन
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श्वांस पर जो भी खड़ा हो
देखता है वह तमाशा आस का
आस की उलझन जिसे है खा रही,
क्या पता हो उसको अपनी श्वांस का?.
अरुण



कोई ऊँचा है तो कोई नीचा
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उपवन में सभी फूल
अपने एक जैसे ही....
जीवंत वातावरण में
जी रहे हैं....
परन्तु बाजार नहीं पहचानता
उनके इस
सम-समान सहस्तित्व को,
मूल्य-जगत में,
गुलाब महंगा है और
गेंदा सस्ता...

इसीतरह,
परमात्म जगत में
सभी एक जैसे होते हुए भी ..
समाज में....
कोई ऊँचा है तो कोई नीचा
-अरुण

एक शेर
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हर किसी के ग़म-ख़ुशी का है अलग तप्सील
दिल में सबके रंग उसका .......एक ही जैसा
अरुण

असहिष्णुता - एक शेर
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मैं तुम्हें अच्छा न कहूँ...... .....तो नाराज़ होते हो
और फिर जो भी कहते हो मुझे बर्दाश्त नहीं होता
अरुण
एक शेर-
असहनशीलता
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इतना भी कहने की जुर्रत न करें के.....दिन ये अच्छे नहीं
वरना, वे एक भीड़ ख़रीद लाएंगे........आपपर थूकने को
अरुण
एक शेर
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जहाँ बादल बोझिल हुआ....... बरस जाता है
बादल न पूछे भगवान से और न ही किसान से
अरुण
एक शेर
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एक ही वक्त ...सभी खेल तमाशों का यहाँ
कुछ अभी कुछ तभी... बस, मन का ख़याल
अरुण
एक शेर
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बहता पानी नदी का हर पल...नया का नया है
मगर बहती चेतना को....पुरातन निगल गया है
अरुण
एक शेर
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चल पड़ा था निजता लेकर.... ढल गया हूँ संस्कारों में
संस्कारों में रमकर अब तो...निजता सारी भूल चुका हूँ
-अरुण

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