Thursday, December 10, 2015

१० दिसम्बर

एक शेर
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चित्र बनते दिख रहे हों आइने में... ......वे नही बनते न होते हैं वहाँ
खोपड़ी में सिर्फ उर्जा का बहाव... मन विचारों की महज़ छाया वहाँ
-अरुण
एक शेर
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जानने की कोशिशें..... नाकाम हैं
सुनके पढ़के बस बने है जानकारी
-अरुण

सत्यदर्शन
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हम सब असत्य
या झूठ ही हैं...
हमारे इस सार्वजनिक
झूठ के झूठत्व का
स्पष्ट दर्शन ही है
सत्यदर्शन
-अरुण

एक शेर
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हर किसी के ग़म-ख़ुशी का है अलग तप्सील
दिल में सबके रंग उसका .......एक ही जैसा
अरुण

एक शेर
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आतंकियों के बम मिसाइल रूस की हो
धर्म ऊर्जाका ....अधार्मिक बन गया  है
अरुण
एक शेर
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उभर आते  हैं वेद सारे.....कोरे काग़ज़ पर
चितका कोरापन ही..... उनको पढ़ पाता है
अरुण
एक शेर
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कहने को कुछ न होता तो न होती भाषा
पाने को कुछ न होता तो न होती आशा
अरुण





एक शेर
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सतह पर गिरती-ओ- उठती है लहर
है नतीजा भी वजह भी.... ये लहर
अरुण
एक शेर
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लाख पोछो या के झाड़ो तुम उसे...
दीवारे पत्थर है न कुछभी दिख सके उसपारका
अरुण
एक शेर
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जो है नही जिंदा..... ....मरा सा भी नही लगता
ये माजी है.. बडा ज़ालिम.. हटाने से नही हटता
अरुण
एक शेर
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जो ख़ुद हो प्रज्वलित..... उसके लिए तो रौशनी शाश्वत
पराई रौशनी का क्या भरोसा ? चल सको कुछ ही क़दम
- अरुण
एक शेर
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इक घर मिला था मुझको रहन वास्ते मगर
आँगन से दिल लगा तो.. बाहर ही रह गया
- अरुण

आज की यह ताज़ा ग़ज़ल
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हज़ारों हैं ...करोड़ों जीव हैं....  पर  आदमी जो
समझता है..ये दुनिया है....तो केवल आदमी ही

कहीं से भी कहीं पर .....जा के बसता है परिंदा
मगर पाबंद कोई है..........तो कोई  आदमी ही

जभी हो प्यास पानी खोज लेना.. जानती क़ुदरत
इकट्ठा करके रखने की हवस.......तो आदमी ही

बचाना ख़ुद को उलझन से सहजता है यही लेकिन
फँसाता खुद को....बुनता जाल अपना आदमी ही

बदन हर जीव को देता ज़हन..... जीवन चलाने को
चलाता है ज़हन केवल .........तो केवल आदमी ही

खुदा से बच निकलने की ....कई तरकीब का माहिर
खुदा के नाम से जीता ..... .....तो केवल आदमी ही

- अरुण

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