Wednesday, June 1, 2016

मई २०१६

एक मुक्तक
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गुजरता है जहां जहां से अपना होना,
वहां वहां की शक्ल ओढ लेता है
कभी सांस, कभी दर्द, कभी एहसासे जिगर
ज़हन के पास मगर पूरी तरह खोता है
- अरुण
एक शेर
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हवा तो छू रही है पर कभी देखी नही
है दिखता आसमां फिर भी कभी छूता नही
- अरुण
एक शेर
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क्या मिलेगा सोचे रख्खे..... खोजने के पूर्व ही
सत्य उसकी खोज में आये तो आये किसतरह?
- अरुण
एक शेर
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आदमी न किसी बंधन या कारागार में हुआ
बंधन या कारागार का ही नाम.....आदमी
- अरुण
एक शेर
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जिंदगी तो जी रही है खुदको अपने ढंग में
मगर अफ़सोस के बंदा चाहे उसे अपने रंग में
- अरुण

एक शेर
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एक ही चीज़ के हों सौ नाम, चीज़ बँट नही जाती
हो नज़रिए हज़ार भले ही... दुनिया टूट नही जाती
- अरुण
एक शेर
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दरो दीवार........ इसको रोक पाती है नही
यही सच्ची मुहब्बत है, नही कुई राजनीती
- अरुण




एक शेर
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एक ही वक्त कई वक्तों में रहता जो है
बंदा, बीता हुआ, जीता हुआ, अजन्मा है
- अरुण


एक शेर
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ज़मीं पे रख्खे आड़ी.. अपने ज्ञान की सीढी
नही पाया पकड कोई समझ का आसमां
- अरुण

एक शेर
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सामने है जो धरी तस्वीर है जिसमें..
जानी पहचानी हुई एक शक्ल है
जबभी उसको ग़ौर से देखा...
सिवा बस रंग रेखा बिंदुओं के कुछ न था उसमें
- अरुण
एक शेर
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काग़ज़ पे लिख रही है क़लम ख़्याल-ए-ज़हन
काग़ज़ को सिर्फ स्याही का मिलता सवाद है
- अरुण
एक शेर
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उड़ना हो आसमां में पंखों की हो ज़रूरत
ऐसे भी हैं कि जिनको धरती न खींच पाती
- अरुण
एक शेर
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अपनी ख्वाहिशों को जिंदगी में ढालने के बजाय
जी लेने दो ख़ुद जिंदगी को....... उसकी धुन में
- अरुण
एक शेर
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बने बनाये रास्तों की बनी बनाई मंज़िलें
कहो तो, सच मंजिल भी और रास्ता भी
- अरुण







एक शेर
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अपने बनाये पिंजड़े में बंदा फँस गया है
भीतर ही इस जाल के अवारा उड़ रहा है
- अरुण
मराठी बोधस्पर्शिका
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माणूस बंधनात आहे........असे न म्हणतां
बंधने म्हणजेच माणूस.......हेच कथन खरे
स्वातंत्र्याच्या सर्व बाता....लागू नाही त्यास
कारण बांधलेल्या आकाशातच तो ‘मुक्त’ उडे
- अरुण
एक शेर
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मिट्टी को बू नही है किसी मुल्क जात की
ये तुम बंधे हुए हो उसे...........वो अजाद है
- अरुण
एक शेर
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सामने छोर पे जैसीभी होती दिख रही हलचल
उसी को देखकर इस छोर की तस्वीर बनती है
- अरुण
एक शेर
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मै नही हूँ...... है मेरी बस याद भीतर
भूल जाना सत्य को इस, मेरी फ़ितरत
- अरुण



एक शेर
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पाँव ठीक हैं आँखें भी हैं ठीक फिर भी लड़खड़ाता है?
भूत का हांथ पकड........ जो वह आगे बढ़ा जाता है
- अरुण
एक शेर
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असलियत को देख सकने का हुनर होते हुए भी
झूठ से ही दिल लगाने में बड़ा आता मज़ा है
- अरुण
एक शेर
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उस किनारे हो रहा है.........इस किनारे हो रहा
कोई कुछ करता नही है, सब यहाँ बस हो रहा
- अरुण
बनारस के मित्रों को याद करते हुए लिखी यह रचना
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रास्ते उनकी तरफ़ खुलते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

अब भी उनका ज़िक्र छूता है जुबां
अब भी बाकी रूह पर उनके निशां
जिनके साये खाब से हटते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

हो अचानक ख़्याल में उनका दीदार
है दबा सा ज़हन में इक इंतज़ार
फिर भी जो हैं फ़ासले, मिटते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

क्या पता बिसरे या रखते मुझको याद
दिल में उनके मेरी जैसी ही मुराद
इन सवालातों के हल मिलते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही

रास्ते उनकी तरफ़ खुलते नही
वे पुराने लोग अब मिलते नही
- अरुण




एक शेर
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मन में, सामने का चित्र बदले जा रहा रफ़्तार में
पर मुझे लगता के बदले जा रहा है स्थान मेरा
- अरुण
एक शेर
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नज़र के दायरे में जो भी आते......एक हैं
नज़र गर आसमां हो रात दिन भी एक हैं
- अरुण

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