Thursday, June 30, 2016

१ जून से ३० जून २०१६

एक शेर
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जिंदगी खुद चलके आती है जीती है हर सांस में अपने
हम समझते हैं के ये हमारी है.........हम जी रहे हैं उसे
- अरुण

एक शेर- २ जून २०१६
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न यादों का सिलसिला होता न होती खाबों की ज़रूरत
हर साँस आदमी की बन जाती एक मुकम्मल जिंदगी
- अरुण

एक शेर- ४ जून २०१६
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दूर की शुरुवात होती अपने घर से ही, मगर
घर को तो देखा नही... ब्रह्मांड की बातें करें
- अरुण


एक शेर
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गहरा, धूसर, फीका अंधेरा..बंद आँखों में है तीनों का बसर
रौशनी छेडती है पलकों को ..पलके हैं...... बेख़बर बेअसर
- अरुण
एक शेर
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खेल के वास्ते खींची लकीरें थी......... यहाँपर
बिगड़ते मेल दिल का बँट गये सब लोग पालों में
- अरुण
एक शेर
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रोना-हँसना एक जैसा ही दिखे फिर भी समझ के
भीड़ में... हर शख़्स की है दास्ताँ बिलकुल अलग
- अरुण

एक शेर
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सारी दुनिया का होवे एक ही दिल एक ही सांस
बंदा समझे के....... दुनिया उसके लिए जीती है
- अरुण
एक शेर
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जिन रास्तों से थे गुज़रकर आ गये
उन्हींको खींच लाते और बनाते हो नये?
कहींभी चलके जाओ इन बनाये रास्तोंपर
मिलेंगे जो तजुरबे वे नही होंगे नये
- अरुण
एक शेर
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डिब्बा AC हो के होवे General, रेलका
रफ़्तार सबको एकजैसी ही हुई हासिल
- अरुण
एक शेर
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क्षितिज की खोज में निकलूँ ......यही था बारहा ठाना
मगर हरबार मुश्किल बन गया ‘खुद’ से निकल पाना
- अरुण
एक शेर
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जो बात बयां हो न सके क्यों करे बयां ?
लफ़्ज़ों में ढल सके न कभी नूर-ए-जहाँ
- अरुण
एक शेर
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लगी हो आग तो फिर..... आग पे डले पानी
लगी है घरको तो खलिहान क्यों भिगोते हो?
- अरुण
एक शेर
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ढूंढने निकलो तो ‘वो’ कैसे मिले?
‘वो’ मिला ही है उसे बस देखना काफ़ी
- अरुण
एक शेर
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परछाई कहो या कहो ढकी हुई रौशनी का अन्जाम
मस्तिष्क तो है इन्हीं परछाईयों के खेलने का मैदान
- अरुण
जिंदगी क्या चीज है ?...
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जिंदगी चखने की चीज है ..बकने की नहीं
देखने की चीज है .............पढ़ने की नहीं
सुनने की चीज है ............सुनाने की नहीं
फिजा को महकाती है ........बहकाती नहीं
और जब निर्मन हो तो
छूती है सारे अस्तित्व को
-अरुण

हिंदी
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ब्रह्मांड का ही जीवमय इक पिंड मानव देह भी
इस तथ्य को जी रहा....... ‘योगी’ उसीको जानिए
- अरुण
एक शेर
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भटककर मँझधार से मै जो किनारे आ गया हूँ
अब, घाट घाटों दरमियाँ ही राह मंजिल और सफ़र
- अरुण
एक शेर
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जैसा चाहो वैसा दिख जाता यहाँ, हर कोई जिंदाभी और मुरदा यहाँ
प्राण ऊर्जा भर रहे निरजीव में या जीव भरता प्राण में ऊर्जा यहाँ ?
- अरुण

एक शेर
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हज़ारों खिड़कियों से सूर्य धरतीपर उतरता है
लगे प्रत्येक खिड़की को अलग ही सूर्य है उसका
- अरुणl

एक शेर
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हो धूलभरी बुहारी तो धूल कैसे झाड़ना
है मुश्किल मन से मन को मिटा पाना
- अरुण
एक शेर
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लगता है ‘मै हूँ’ का मतलब ये नही ‘मै हूँ’
बना जाता है ‘होने का’ एहसास.... ‘लगना’
- अरुण
एक शेर
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न कोई चीज़.......... और न खरीदनेवाला
मन है इक बाज़ार जहाँ बिक्ता बेचनेवाला
- अरुण
एक शेर
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‘देखने में भूल’ केवल एक ही वह भूल
जिससे जिंदगी की राह बन जाए दुश्कर
- अरुण
एक शेर
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हजारों दूर चलकर भी जहाँ था हूँ वहींपर
खुली आँखें तो पाया पैर केवल चल रहे थे
- अरुण
एक शेर
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इस झूठी जिंदगी को चाहिए एक झूठ अहं का
इसके परे न होवे....... किसी काम का ये झूठ
- अरुण
एक शेर
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है वहाँ भी कुछ जहाँ लगता नही....कुछ होगा
उसी कुछ से उभर आता है सबकुछ नामधारी
- अरुण
एक शेर
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मै, खुद, खुदा, परमात्मा... ये लफ़्ज़ केवल हादसे हैं
ये नही होते तो कुदरत.............. सोवे रहती चैन से
- अरुण
एक शेर
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दिल की बात जबां पर जस की तस नही आती
है यही वजह शायद के....... सच बयां नही होता
- अरुण




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