Monday, March 14, 2016

14 March 2016

एक शेर
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कुदरत की कोख है......कुदरत निकल रही
हमने समझ लिया के....... बेटा जनम रहा
अरुण


है समंदर ही उछाल लेता हुआ
न मौजों से मौज...... टकराए
पूरे ज़हन का मथना... ख़ुद में
कोई  न मन को .......चलवाए
- अरुण

रुबाई
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जिंदगी द्वार खटखटाती है.... हाजिर नही है
टहलता है घर से दूऽऽऽर..... हाज़िर नही है
ख़याली शहर गलियों में.. भटकता चित्त यह
जहांपर पाँव रख्खा है वहाँ ...हाज़िर नही है
अरुण
एक शेर
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बहका मन फिर मन से ना वो राजी होता है
क़ाबू करनेवाला ही......... बेकाबू होता है
अरुण
एक शेर
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उजाला हो दिखे अंधियार में दिखता नही
नज़र में रौशनी हो तो.....सबब कोई नही
अरुण
एक शेर
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साया दिख रहा हो.. पर कभी छूता नही
मतलब शब्द को छूता मगर दिखता नही
- अरुण

एक शेर
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हवा ही बात करती है हवा से आती-जाती है
हकीकत तो जमीनी थी यहींपर और यहीं है
अरुण

एक शेर
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नही हैं रास्ते दो ज्ञान भक्ती....... ........दो अदाये हैं
हिलाकर सर कोई तो सर झुकाकर दाद देता है कोई
अरुण
एक शेर
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आग से उठ्ठे धुएँ में... एक निश्चय आ बसा
खोज लूँ अंगार वह जिसने ऊगाई आग थी
अरुण

एक शेर
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रास्ते की हर खरी बाधा का होते ज्ञान भी
चूक जाती है नज़र और पाँव गिरते खड्ड में
- अरुण

एक शेर
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सामने से जो भी गुज़रे अपनी यादें छोड़कर
उन तजुर्बों के बदौलत.... जी रहा हूँ उम्रभर
- अरुण
एक शेर
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जान जी रही है ....अभी इसी धड़कन में
हम तो जी रहे हैं बेजान.. किसी माजी में
अरुण
एक शेर
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जिसे शुरुवात कहते हम किसी का अंत है
यहाँ जो भी हुआ होता रहे.... बस अनंत है
अरुण
एक शेर
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नज़र है सामने पीछे मगर वह देखती रहती
क़दम चलते डगर हर वक्त, जो सहमें हुए
अरुण
एक शेर
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अपने साये से परेशां हो चुका हूँ
भागना चाहूँ तो भागूँ किसतरफ
- अरुण




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