Thursday, March 31, 2016

31 March 2016

एक शेर
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जो नही पाया जनम.........मरने का उसके इंतजार
जिसका होना सच नही उस ‘मै’ को क्योंकर मारते
- अरुण
एक शेर
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जो बिलकुलI साफ़ होता है नही आता नज़र
हवा छूकर निकल जाये.... नही आती नज़र
- अरुण
एक शेर
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अपनी ख्वाहिशों को जिंदगी में ढालने के बजाय
जी लेने दो ख़ुद जिंदगी को....... उसकी धुन में
- अरुण
मुक्तक
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कमाना ज्ञान हो तो कोशिशें करनी पड़ें
धरा है सामने बस बूझना काफ़ी हुआ
जिनको मिला ऐसेही सस्ते में मिला है
जिनको नही..... वे जूझते ही रह गये
- अरुण
एक शेर
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बदल रही है जगह या बदल रहा है स्वरूप
खड़ी है वस्तु सगर...... राह पे चलते चलते
- अरुण
सगर=सभी
एक शेर
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जो बीत गई वो बीत गई.. जिंदा नही है
याद में आना किसीका..कोई आना नही है
- अरुण
एक शेर
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हर कदम पे असलियत को भूलना चाहे
मगर, उसकी चर्चा उम्रभर करता रहे
- अरुण


एक शेर
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जबतलक आदमी... आदमी से मुख़ातिब न था
झंझटें रिश्तों की बसा करती थी........कोसों दूर
- अरुण

एक शेर
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जी लेना जिंदगी को..न जाने क्या होता है?
अबतक तो जिंदगी ने ही जिया है मुझको
- अरुण
एक शेर
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जो जैसा है ठीक वैसा ही नही लगता
है यही वजह.......सारे शोरो शराबे की
- अरुण

 एक मुक्तक
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न होगी कुई चाह
न होगी साँसों में कुई उमंग या आह
मगर अफ़सोस, जिंदगी बन चुकी है
चाहत का ही इक सिलसिला
- अरुण
एक मुक्तक
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जहाँ सच पड़ा हो झूठों के हांथ और
झूठ ढल चुका हो अच्छे नारों में
ऐसी विसंगत स्थिती को
कह लीजिए
रा-ज-नी-ति
- अरुण
मुक्तक
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मै चलता हूँ तभी
नीचे बनती जाती है जगह
और तभी समय भी निकल पड़ता है
उस जगह पर घटनेवाले
मेरे चलन या मेरी गति को आँकने के लिए....
जगह और समय के संपर्क में
जगह और समय से जुडी सारी बातें/चीज़ें
जगा देती हैं
एक ‘मै’ और अनेकों ‘वो’......
इसतरह द्वैत उभरते ही
एक जगत उभरता है...
और फिर मै और मेरा जगत टिके रहते हैं एक दूसरे पर
एक अविरत भ्रमजाल के रूप में
- अरुण
एक शेर
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जो चल पड़े.. है खयाल उसमें..वक्त-ओ-फ़ासले का
जो दिख पड़े है उसे..... उस नज़र- ओ- नज़ारे का
- अरुण
एक शेर
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गुबारे में हवा भर दो अकड़कर वो उड़ा जाए
दिवारों को भी ललकारे मगर काटों से कतराए
- अरुण
एक शेर
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जिनका नही वजूद कोई..... फिर भी है एक जहान जिनका
ये मन-परछाइयाँ, जो रिश्ता बनाती चलाती और निभाती हैं
- अरुण

एक मुक्तक
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यह जिंदगी है या सिनेमा हॅाल, जहाँ
रोशनी जगाती नही सुलाती है
हॉल में तो अंधेरा ही मगर रोशनी स्क्रीनपर
कल्पनाओं के चलचित्र बनाती है
- अरुण
एक मुक्तक
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क्या नही ‘मै’.... जानना मुश्किल नही
क्या हुआ ‘मै’......कौन कैसे जान पाए?
फ़ासला हो बीच...... तब ही जान सकते
हो सकल एकत्व वह क्या जान पाए?
- अरुण

















   

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