Sunday, April 2, 2017

March 2017

मुक्तक
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हाँ..ना.. में दिया जा सके.... जिंदगी ऐसा जवाब नही
कोई रखे हिसाब इसका.... जिंदगी ऐसा हिसाब नही
अनगिनत हैं अक्षर यहाँ  ............. अनगिनत तजुर्बे हैं
जिंदगी कुछ जाने पहचाने अक्षरों की..... किताब नही
-अरुण

मुक्तक
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जीने की तमन्ना ने बाँटी सारी दुनिया दो हिस्सों में
जो इधर हुआ अपना हिस्सा जो उधर बचा सारा जहान
-अरुण

अभी यहाँ कल ही कल
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अभी यहाँ जो भी है.... आँखों के सामने
देखता उसको तो.. जो कल है बीत चुका
अभी यहाँ सपने भी..... आनेवाले.. कल के
कल तो बस कल ही है.. आये या ना आये
-अरुण

एक शेर
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इधर इसका जले इतिहास....... तो जलता उधर उसका
धुआँ और आग तो सबकी..... नही इसकी नही उसकी
-अरुण

चेतना का काम है चे.त.ना ..जब चेतती है हर एक के बीते हुए अनुभवों को,  याद के रूप में चेताती है।अनुभवों में व्यक्तिगत भिन्नता होने के कारण, लगता यूँ है कि हरेक के भीतर जलती चेताग्नि ..
दूसरों के चेताग्नि से भिन्न है..।  सच तो यह है कि सबकी चेतना की आग और यादों का धुआँ तो common ही है।

जबतक अंतरदृष्टि न चौंधे
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आकाश में बिजली चौंधनेपर
पसर जाती है अचानक सर्वव्यापक रौशनी
और मिट जाता है सारा का सारा पसरा अंधेरा

हमारे इस रोज़ाना जिंदगी में
मन में.. अंतर्दृष्टि की चकाचौंध
जबतक नही होगी
सर्वव्यापक अवधान भी न पसरेगा....
हम विचारों के आभासित प्रकाश में ही
अपना रास्ता बनाते हुए
नज़र आते रहेंगे
फिर भी
रहेंगे तो हम तमस में ही....
इच्छाओं के भ्रम में उलझे
और भ्रम-जाल से निकलने के
मिथ्या प्रयासों में
डूबे हुए
-अरुण
मनुष्य में सकलता का अभाव
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आमतौर पर,
 उसकी विचारशीलता को
आधार मानकर
मनुष्य को विवेकधारी पशु या
Rational Animal) कहा गया
परंतु दुनिया का परिदृश्य तो कुछ अलग ही कहानी कहता है
सच्ची बात तो यह है कि
मनुष्य से जादा विवेकशून्यता और कहीं भी नही
और जगत में मनुष्य से अधिक स्व-केंद्रित भी कोई नही
उसकी स्व-केंद्रितता उसे प्रकृति से जुदा कर रही है

प्रकृति से समरसता के मामले में भी
पशु मनुष्य से आगे है
दुसरी ओर,  अपने समूह में भी
मनुष्य पूरीतरह से घुलमिल नही पाता

क्योंकि उसके विचारों में स्वरसता का प्रभाव है
और सकलता का अभाव
-अरुण
रिश्ता तर्क और समझ का
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तर्कपूर्ण समझ ही विज्ञान है
समझपूर्ण तर्क को ही प्रज्ञान कहिए
तर्कहीन समझ है.....एक जानकारी या ज्ञान
समझहीन तर्क को अज्ञान कहिए
-अरुण
मानवता का सागर
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मानवता के
इस विस्तीर्ण सागर में
हज़ारों लाखों करोड़ों घडे तैर रहे हैं
हर घड़ा लहरों पर सवार होकर
जिधर लहरें ले जाएँ उधर बढ़ रहा है
लहरों से छलकता जल अपने में समेटते हुए
आगे बढ़ रहा है अपनी उम्र की राह पर

घडा अपने को दूसरे घड़ों से अलग
समझते हुए अपने भीतर
संकलित जल को भी अपना मान लेता है

क्योंकि वह बेख़बर है कि ...
न तो वह जल उसका है और न ही वह मिट्टी
जिससे वह बना है
-अरुण

“व्यक्तिपन”
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जंगल में खड़ा पेड खड़ा
और जंगल के बाहर बस्ती में
अकेला खड़ा वृक्ष.....दोनों ही
न तो अकेलापन महसूस करते हैं
और न ही कोई सामुहिकता, क्योंकि....
भीतर दोनों के ही
कोई भी “व्यक्तिपन” नही पनपता

“व्यक्तिपन” की भूल तो
आदमी के साथ ही घटती रही है
और शायद घटती रहेगी
आदमी ही महसूस करता रहेगा
या तो अकेलापन
या सामुहिकता का दंभ
-अरुण
वसुधैव कुटुंबकम्
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पेड के पत्ते ने कभी नही कहा
“पेड ही मेरा कुटुंब है”
ज़िंदा सांसे हर लहर की अपने को
सागर ही समझती हैं.....लहर नही

परंतु क्या यह अजीब नही कि हम इंसान
जो भीतर में दूसरों से डरे डरे हैं....
इस पढ़ी पढ़ाई शब्दावली को
रुक रुककर दुहराते रहते हैं...
सारी वसुधा ही हमारा कुटुंब है...
वसुधैव कुटुंबकम्
-अरुण
विचार
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हँसाते हैं विचार...विचार ही रुलाते हैं
विचार ही रखते हैं सजग गंभीर और निष्पक्ष
विचारों में बदल होते बदल जाता विचारक
विचारों और विचारक में कहाँ है भेद कोई?

स्थिती को देखना सुनना सभी का एक जैसा
मगर उस देखने-सुनने में घुस जाते विचार
किसी के वास्ते है वह स्थिती सुखमय सुखद
किसी पे आ गिरा हो दु:ख का कोई पहाड़

सभी ये वेदना-संवेदनाएँ शांत निर्मल
और सजग होते हुए भी,
आदमी बेहोश और अस्वस्थ है
बस...विचारों की वजह से
-अरुण
मन का घना वन
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बीज पसरे तो............. पेड और जंगल पसरे
जंगल में फँसे हुए तो निकल भी सकते हैं बाहर
कल्पना के बीज से ही पसरता है मन का घना वन
इस वन में खोया हुआ न कोई बाहर आया है अबतक
-अरुण

आभासमय है जीवन
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पेड की परछाई को छूने से....
पेड का स्पर्श नही होता..
यह बात सबको मालूम है अच्छे से.....फिरभी
असत्य को ही सत्य समझने की भूल सभी कर रहे होते हैं

अस्तित्व गतिशील है सर्वत्र..देह के बाहर और भीतर भी
इस गति से मनुष्य की दृष्टि-गति एवं समझ-गति...
दोनों ही मेल नही खाती और..... इसकारण
सीधे अस्तित्वगति को देखने की जगह
उसके आभास को ही.....अस्तित्व समझकर...
आदमी जीवन जी रहा है
-अरुण
होता कुछ और..लगता कुछ और
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अंधेरे में ज़मीन पर पड़ी हुई रस्सी
देखते ही
भय और असुरक्षा महसूस हुई
वजह इसकी साफ़ थी
देखनेवालेको... रस्सी.. रस्सी न लगकर.... साँप लगी

कहने का मतलब....होता कुछ और है
और लगता कुछ और

अस्तित्व है....”कुछ होते रहना”
मगर मन है.....”कुछ और ही लगते रहना”

‘‘होने’ और ‘लगने’ के भेद को....भेद सकता है
केवल ध्यान
न कोई मन.. न कोई ज्ञान
-अरुण
अस्तित्व का धर्म
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हो रहा दिन.. हो रही है रात
पर ये बात...
हरदम ख़्याल में रखे रहो के

सिर्फ पल पल में बदल
बदलाव ही
अस्तित्व का है धर्म

इसे दिन कहें या रात?
सिर्फ अपने चयन की बात
-अरुण
जीवन सारा प्रतिबिंबों का, बिंब बिंब से खेल रहे हैं
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प्रतिबिंबों के रूप बदलते, नये चित्र प्रतिमाएँ रचते
उन्हे हिलाते उन्हे मिलाते, नया रूप धर बोल रहे हैं

प्रतिबिंबों के बिंब बन रहे, बिंबों के नव बिंब बन रहे
इस बिंबात्मक मन में हरदम, बिंब सजग लग रेल रहे हैं

बिंब कणों की यात्रा चलती, विचार गढ़ती विचार करती
आती बीती की बातों से........ भूतभावि को ठेल रहे हैं

प्रतिबिंबों की पूरी रचना..........जब चेते यह पूरी रचना
अपना व्यर्थ स्वरूप निहारे, सत-स्वरूप पा डोल रहे हैं
-अरुण
सारी कायनातही नज़रों में....
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वैसे तो, सारी कायनातही नज़रों में बसी रहती है
ये ज़रूरतें हैं........... जो नज़रों को सिकुडती रहती
वैसे तो देख सकता है ये इंसान... सभीकुछ लेकिन
नज़रों को सिर्फ...................उसकी जरूरत दिखती

जो कुछ हो रहा है इर्द गिर्द............. औ  ख़ुद में
छोटासा हिस्साही......... उसकी पकड का है हिस्सा
ये ज़मीं आसमान...................बंदा है सारी दुनिया
फिर भी उसकी समझ में वो तो सिर्फ इक क़िस्सा
-अरुण
जीवन-कला
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न ये दुनिया और न ही यह जिंदगी...
किसी मक्सद की ओर दौड़ रही है
केवल चलते रहना ही इसका काम है
इसी चलते रहने या जीवनगति के
आनंद में डूबे रहना ही है...
जीवन की कला
-अरुण
स्वामित्व
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हर वस्तु, पदार्थ और जीव ही
स्वयं का मालिक है
कोई अन्य उसका स्वामी नही,

वैसे तो स्वामी या स्वामित्व
केवल एक विचार या संकल्पना मात्र है
यह संकल्पना जब किसी चीज आदि से
जुड जाती है या उससे
तादात्म स्थापित करती है
मन में स्वामित्व का भाव जाग जाता है
-अरुण
किताबी जीवन
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अगर आध्यात्मिक किताबें न होती..
न होती दार्शनिक नसीहतें
तो शायद आदमी
अपनी मौलिक मनवेदनाओं का हल
स्वयं में ओर स्वयं से ढूँढता
अपने को समझते समझते पूरी मानवता के
स्वभाव को देख लेता

पर ऐसा हुआ नही
कुछ अपवादों के साथ..
आदमी आँखें बंद किए हुए
दूसरों की नज़रों से दुनिया को
जानने के लिए प्रवृत्त हुआ
अपना जीवन जीने की जगह
किताबी जीवन जीने लगा
-अरुण
अजब यह व्याकरण और गणित
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जानना ही जानता है...जो जना(जाना) जाए
अजब है व्याकरण इस जिंदगी का,
कर्ता क्रिया और कर्म सबकुछ
एक क्षण और एक स्थल में ही सिमट जाए

पेड ही जड़ और पत्ता, दृश्य दर्शन और द्रष्टा
एक ही ह्रद-श्वांस में सबकुछ गना जाए
अजब है यह गणित इस जिंदगी का
-अरुण

मोटेतौर पर तीन तरह के लोग
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मोटेतौर पर तीन तरह के लोग इस दुनिया में रहते हैं
एक वह जो देखे बिना ही किसी बात को मान लेते हैं
दूसरे वह जो बात को देखते और उसपर सोचते रहते हैं
तीसरे वह जो बात को देखते.. सोचते और
ख़ुद में, उसे पूरी तरह स्पष्टता से समझ लेते हैं

पहलेवाले बंधन में रहते हुए भी नही जानते कि वे बंधन में हैं
दूसरेवाले बंधन के दर्द को महसूस करते हुए
या तो उससे समझौता करते हैं या संघर्ष
 
तीसरे वे जिनकी स्पष्ट एवं समुचित समझ उन्हे
बंधन में फंसने ही नही देती
-अरुण
सत में रहते सत ना जाने
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केवल रात ही रात होती जीवनभर तो
रात को ही आदमी दिन समझ लेता
दिन में भी अगर होता वह बंद कमरों में
आशय दिन का किताबों में ही रहता

असत ही है जब जीवन का तानाबाना
लगता आदमी को यही है असली जीना
अपनी साँस ओ धड़कन को किए नज़रअंदाज़ै
पूछे संतों से..कहाँ है मेरी धड़कन मेरी साँस?
-अरुण
दिखता है वही...
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जब भी देखता हूँ...बाहर या भीतर
दिखता वही है जो अबतक देखा है
वैसा का वैसा या.. थोडासा बदलासा
वही बने नया जो पहले से सीखा है
-अरुण
तन के बोल मन की मनमन
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एक दूसरे के सामने खडे हुए,
हम एक दूसरे से बात करते हुए दिखते हों भले ही,
पर सच तो यह है कि
मेरा मन मेरे मन से और तुम्हारा मन तुम्हारे मन से,
इस तरह दोनों ही, अलग अलग, अपने स्वयं से ही बोल रहे हैं

बोलना और सुनना, चुंकि, एक दूसरे की ओर निशाना साधे,
खुलकर चल रहा है, मान लिया जाता है हम दोनों
एक दूसरे से वार्तालाप कर रहे हैं।

सामुदायिक रूप से चल रहा यह सारा शोरशराबा
आदमीयों के मनों के भीतर चल रही
मनमन का ही परिणाम है
-अरुण
क्षितिज और मन
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क्षितिज धरती ही नही आकाश से भी दूर है
होता नही है जो मगर.. फिरभी नज़र आता
आदमी का मन क्षितिज जैसा....निरा आभास
होता नही है फिरभी जग...इसमें समा जाता
-अरुण
‘उसे’ निर्गुण निराकार क्यों कहते हैं?
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हवा पर तैरते बादल नही आकार उनको
हमें जो चाहिए आकार हम वह देख लेते
हमें जो चाहिए वैसीही दिखती है ये दुनिया
नही आकार गुण और नाम लेकर यह उगी है
-अरुण
मन का उजाला.. अंधेरे ही जैसा
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मन हमें अपने ही उजालों में भटकाये रखता है
और फिर हम हो जाते हैं
प्रकाश की संभावना से कोसों दूर

कोसों दूर.. इसलिए
क्योंकि मन ही हमें प्रकाश जैसा लगने लगता है
अपनी तमाम परेशानियों का समाधान
हम मन में ही खोजने लगते हैं.. और फिर
जिसे समाधान समझते हैं वही उभरकर
बन जाता है एक नई परेशानी

“परेशानी... समाधान और फिर परेशानी”
इस शृंखला से तभी मुक्ति संभव है
जब आदमी मन के उजालों से
चिपके रहने के बजाय
मन को ही प्रकाशित हुआ देख ले
-अरुण

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