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सच्ची बातें और कुछ कविताएँ

सच्ची बात ************ भीतर.. प्रकाश कायम है...लाना नहीं है, फिर आदमी अदिव्य  (unenlightened) क्यों है?, क्योंकि कल्प-सामग्री  (image-material) से बने ज्ञान-समझ-अहंकार की दीवार ने प्रकाश को उसतक पहुँचने से रोक रख्खा है, जब दीवार ढहेगी तब ...दिव्यत्व जागेगा -अरुण   सच्ची बात ************ किसी अनजान शहर में ......राह चलते जो भी दिखता है उसे हम देखते जाते हैं - आदमी, पेड़, वस्तुएं, दुकाने... ऐसे ही  सबकुछ - उनसे एक रिश्ता तो बनता है पर न तो हम उन्हें स्वीकरते हैं और न ही उन्हें नकारते हैं. इसतरह जुड़कर भी अनजुड़े रहे रिश्ते में आदमी का स्व (Self) उघाड़ता जाता है बिना किसी कोशिश के भीतर बाहर का अभिन्न्त्व खुला हो जाता है आदमी के ‘भीतर’ का उसके ‘बाहर’ से यही खरा रिश्ता है. परन्तु हम तो हमेशा ...पूर्वाग्रह ग्रस्त (baised और prejudiced) रिश्तों में ही जीते हैं -अरुण रुबाई ******* आसमां वक्त से हटते हुए........ ..देखा न कभी हर सेहेर  बाद रात....सिलसिला बदला न कभी कभी तूफान कभी मंद....... ..कभी ठहरा समीर आसमां अपनी जगह ठहरासा,  हिलता न क...

कुछ सच्ची बातें

सच्ची बात ********** कोईभी रचाता नही है जगत ये है रचना जो खुदसे रची जा रही है जिसे ये समझ आ गई बात गहरी उसे हर जटिलता सुलभ लग रही है - अरुण सच्ची बात ********** न किसी की मेहरबानियों के लिए हूँ झुकता..... जमीं चूमने के लिए है कुदरत में घुलना.. सही जिंदगी नही उससे......कुछ माँगने के लिए अरुण सच्ची बात ************ सृष्टि की न भाषा कोई.. न है बोलना उसे सृष्टि बनकर रहना और फिर .भोगना उसे संवाद विवाद न चक्कलस न चर्चा ज़रूरी जिओ केवल उसमें समाए, न परखना उसे अरुण सच्ची बात ********** जिंदगी हाँ.. ना......में दिया जबाब नही हिसाब रखनेवालों का ......हिसाब नही अनगिनत अक्षर हैं ....नये नये तजुर्बों के कुछ जानेपहचाने अक्षरों की किताब नही अरुण सच्ची बात *********** डर नही है मौत का.. है जिंदगी खोने का डर जी नही पूरीतरह से ..अधुर रह जाने का डर लम्हा लम्हा जिंदगी का जो जिया पूरी तरह मर रहा लम्हे में उसको खाक मर जाने का डर अरुण सच्ची बात ************ सत्य और शांति की तलाश में हिमालय जैसे निर्जन (जहाँ कोई जन न हो) स्थलों पर जाना भी ठीक होगा, अगर तलाश करनेवाला अ...

रुबाई

रुबाई ******* ज़र्रा ज़र्रा है जुदा ना मलकियत उनकी अलग फिर करोड़ों में मेरी ये शख़्सियत कैसे अलग? यह उतारा दिल में जिसने सच्चा बुनियादी सवाल देखता ख़ुद में खुदाई ना खुदा जिससे अलग - अरुण

तीन रुबाईयां

रुबाई १ ******* हकीकत को  नजरअंदाज करना ही नशा है असल में होश खोता आदमी ही....दुर्दशा है तरीके मानसिक सब,...होश खोने के यहांपर ललक भी कम नही, बेहोश होना ही नशा है - अरुण रुबाई २ ******* बैसाखी के बल लँगड़ा ...चल पाता है अंधा हर हांथ का भरोसा..कर लेता है होश को चलना नही होता..ये अच्छा है बिन चले जागी निगाहों से पहुँच जाता है - अरुण रुबाई ३ ******* ये बस्ती ये जमघट हैं सुनसान मेले सभी रह रहे साथ.. फिर भी अकेले जुड़े दिख रहे.....बाहरी आवरण ही परंतु..ह्रदय धाग .... ......टूटे उधेडे - अरुण

६ रुबाईयां

रुबाई १ ****** हांथ वक्त का थामा तो माजी में ले जाता है वक़्त का सरोकार... जिंदगी से हट जाता है जिंदगी की साँस में सांसे मिलाओ ओ' जिओ देख लो कैसा मज़ा जीने का... फिर आता है - अरुण रुबाई २ ******* बूंद चाहें कुछ भी कर लें ना समंदर जान पाएं खुद समंदर हो सकें जब लहर में गोता लगाएं जाननेसे कित्ना अच्छा ! जान बन जाना किसीकी एक हो जाना समझना एक क्षण सारी दिशाएं - अरुण रुबाई ३ ***** तार छिड़ते.....वेदना से गीत झरता है विरह के उपरांत ही मनमीत मिलता है प्रेम शब्दों में नही...संवेदनामय दर्द है आर्तता सुन प्रार्थना की देव फलता है - अरुण रुबाई ४ ******* हरारत जिंदगी की सासों को छू जाती है लफ़्ज़ों में पकड़ो, बाहर निकल जाती है लफ़्ज़ों को न हासिल है ये जिंदगी कभी जिंदगी दार्शनिकों को न समझ आती है - अरुण रुबाई ५ ****** दूसरों के साथ रहो...नाम पहनना होगा किसी भाष को जुबान पे ..रखना होगा जिसका न कोई नाम भाषा, उस अज्ञेय को भीतर शांत  गुफ़ाओं में ही जनना होगा - अरुण रुबाई ६ ******* पत्ते फड़फड़ाते हैं ......डोल रही हैं डालियाँ किसने उकसाया हवा को ? लेने अं...

आठ रुबाईयां

आठ रुबाईयां ************** रुबाई १ ****** प्यार में गिरना कहो ....या मोह में गिरना कहो इस अदा को बेमुर्रवत .....नींद में चलना कहो नींद आड़ी राह ..जिसपर पाँव रखना है सरल जागना चलना ना कह, उसे शून्य में रहना कहो - अरुण रुबाई २ ****** जिंदगी द्वार खटखटाती, हाज़िर नही है टहलता घर से दूऽऽऽर, ..हाज़िर नही है ख़याली शहर गलियों में भटकता चित्त यह जहांपर पाँव रखा है वहाँ  हाज़िर नही है - अरुण रुबाई ३ ***** कुदरत ने जिलाया मन. ..जीने के लिए होता  इस्तेमाल मगर......सोने के लिए जगा है नींद-ओ- ख़्वाबों का शहर सबमें मानो जिंदगी बेताब हुई....मरने के लिए - अरुण रुबाई ४ ****** खरा इंसान तो इस देह के.. अंदर ही रहता है वहीं से भाव का संगीत मन का तार बजता है जगत केवल हुई मैफिल जहाँ संगीत मायावी सतत स्वरनाद होता है महज़ संवाद चलता है - अरुण रुबाई ५ ***** बाहर से मिल रही है ..पंडित को जानकारी अंदर उठे अचानक.......होऽती  सयानदारी इक हो रही इकट्ठा........दुज प्रस्फुटित हुई यह कोशिशों से हासिल, वह बोध ने सवारी - अरुण रुबाई ६ ******* 'जो चलता है चलाता है उस...

तीन रुबाईयां

रुबाई ******* बैद मन का.. मर्ज़ को अच्छा नही करता टेढ़ को सीधा करे .....अच्छा नही करता सबके सब सीधे से पागल.. ऐसे सीधों से वह कभी मिलता नही ...चर्चा नही करता - अरुण रुबाई ***** ठहराव नही है ......है बहाव जिंदगी न रुका कुछ भी, न पड़ाव है जिंदगी न चीज़, न शख़्स, न जगह है कोई 'है' का न वजूद यहाँ, बदलाव है जिंदगी - अरुण रुबाई ******* सिक्के के पहलुओं में दिखता विरोध गहरा भीतर से दोनों हिलमिल आपस में स्नेह गहरा ऊपर से दिख रही हो आपस की खींचातानी भीतर में बैरियों के ... बहता है प्रेम गहरा - अरुण