Monday, September 13, 2010

मन का अभेद्य अंधकार

कहते हैं उजाले के सामने

अँधेरा टिकता ही नही

परन्तु मन का अँधेरा अलग है

मन का अँधेरा जहाँ से भी गुजरे

बिना देखे ही उजाले को निगल जाता है -

अँधेरे में ही राह बनाते जाना

मन का धर्म है

इसीलिए सत्य का चिर-प्रकाश

वह कभी भी देख नही पाता

जो भी चिर-प्रकाशित हो गये

वे मन-विलोपन के बाद ही हुए

क्योंकि मन से चिर-प्रकाश देखा ही

नही जा सकता

.................................... अरुण


1 comment:

Mrs. Asha Joglekar said...

मन का अँधेरा जहाँ से भी गुजरे

बिना देखे ही उजाले को निगल जाता है -
इसी लिये मन को आलोकित रखना होगा ।
कलुष के अंधेरे को चीरना होगा ।
अच्छी प्रस्तुति पर इतनी निराशा क्यूं । मन के रहते भी सत्य देख लें ।