Tuesday, September 14, 2010

प्रेम यानी अनन्यभाव

जिनमें अनन्यभाव जागा

प्रेम और करुणा फल उठी

साधारणतया हम जिसे प्रेम कहते हैं

वह अपनत्व, लगाव, आत्म- तादात्म , सहानुभूति

समानुभूति, समवेदना से अधिक कुछ भी नही

इन सारे भावों में 'मै' का अस्तित्व बना रहता है

आत्मसत्ता काम करती रहती है

अनन्य भाव का अभाव रहता है

...................................................... अरुण

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