भारत में जनतंत्र स्थापित तो हुआ पर सही माने में नहीं. जनप्रतिनिधि और सरकार के चयन की कारवाई में जनता शामिल तो हुई परन्तु पूरी जिम्मेदारी के साथ नहीं. चुनाव के बाद जनता अपनी सारी जिम्मेदारियों का बोझ चुने हुए लोगों पर छोड़कर निश्चिन्त हो जाती है. चुने हुए लोग भी पूरी जिम्मेदारी को प्रशासकों और शासकों पर छोड़ देते हैं. जनता का काम केवल चयन करना नहीं बल्कि सतत निगरानी करते रहना है. यह बात न तो जनता ने सीखी और न ही ऐसी सीख जन-मन में उपजाने वाले लोग सामने आए. जो भी आये वे सब धरना, आन्दोलन, भूक हड़ताल या तोड़फोड़ में ही रस लेते दिखे. उनकी रूचि जनता को आगे लाने में नही.. बल्कि अपने को आगे रखने में बनी. जनता अगर सतत निगरनी करती रहे तो धरना-आन्दोलन और ऐसे उपायों का अतिरेक अपने आप कम हो जाएगा. इन उपायों का उपयोग केवल संकटकाल में ही होना उचित होगा. जनता ने केवल उदासीन और असंतुष्ट होना ही सीखा है, सतर्क और आश्वस्थ होना नही. -अरुण
मनधारी मानव का दुखी रहना स्वाभाविक है. दुःख से भागने के लिए ही वह सुखों में लिप्त होता है और इस सुख-लिप्तता से भागने के लिए, वह त्याग का प्रतिष्ठित उपाय ढूंढ लेता है. ये सब उपाय, दुःख से ही पलायन की तरकीबें हैं. जो दुःख के समक्ष ध्यानस्थ हो खड़ा हो गया, वही आत्म-साक्षात्कारी हो सका. -अरुण
हम सब भारतीयों को ऐसा गणतंत्र मिले जो गुटतंत्र , लूटतंत्र , झूठतंत्र , वोटतंत्र , भयतंत्र तथा लोकलुभावन तंत्र से मुक्त हो, लोगों और शासकों के बीच की दूरी हट जाये मीडिया स्वतंत्र तो हो ही , ईमानदार भी हो ...... यही शुभकामनाएँ - अरुण
यह मस्तिष्क दिनभर की अच्छी बुरी झंझटों से थका हारा अपनी थकान हटाने सो जाता है , अगली सुबह बीती सिलवटों से मुक्त होकर , तरोताजा बन जाग उठता है कुछ ही ऐसे है...जिनका मस्तिष्क दिन के ही हर क्षण तरोताजा होता रहता है क्योंकि उनका मस्तिष्क चेतना के कण कण को, क्षण क्षण को त्रयस्थता से देखता रहता है बस देखना ही देखना है, देखने में ही कृति (action) है -अरुण