Saturday, January 25, 2014

सही जागरण सही नींद



यह मस्तिष्क दिनभर की अच्छी बुरी झंझटों से थका हारा
अपनी थकान हटाने सो जाता है,
अगली सुबह
बीती सिलवटों से मुक्त होकर, तरोताजा बन जाग उठता है
कुछ ही ऐसे है...जिनका मस्तिष्क दिन के ही हर क्षण तरोताजा होता रहता है
क्योंकि उनका मस्तिष्क चेतना के कण कण को,
क्षण क्षण को त्रयस्थता से देखता रहता है
बस देखना ही देखना है, देखने में ही कृति (action) है   
-अरुण    

1 comment:

संजय भास्‍कर said...

सुन्दर प्रस्तुति...!