तीन पंक्तियों में संवाद

अच्छों- बुरों से सोहबत तो कर के देख ली
बदनाम ही बचे थे जिनको न मिल सका

शायद उन्ही में होगा कोई रहनुमा मेरा
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किसीको पाना हो कोशिशों पे चढ़ जाना
किसी का हो लेना आसमाँ से गिर जाना

खुद का बोझा छोड़ते राजी हो हर बात
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शब्द सारे खोखले हैं
उनसे पूछो तो दिखाते अंगुली केवल

शब्दों के कई घाट, अर्थों का केवल एक प्रवाह -जीवन प्रवाह
..................................................... अरुण

Comments

आज बहुत दिनों बाद इस तेवर की अद्भुत कविता पढ़ी।
आभार।
क्षमा कीजिएगा आप की पंक्तियों में थोड़े परिवर्तन कर रहा हूँ - बस ऐसे ही।
..शब्द सारे खोख(क)ले हैं
उनसे पूछो तो दिखाते अंगुली केवल।

शब्दों के कई घाट, अर्थों के कई (इक नहीं) प्रवाह -अकेला जीवन प्रवाह।
अपना परिचय तो हिन्दी में कर दीजिए मान्यवर !
Udan Tashtari said…
बहुत बढ़िया...गिरिहेश भाई की आवाज में सुर मिलाता हूँ.
Arvind Mishra said…
नया शिल्प पुरातन बोध !