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देह-मन-बुद्धि और बुद्धत्व

आत्म-चिन्तन दर्शाता है कि अस्तित्व और देह के बीच भेद का भाव उभरने के साथ ही, देह से मन उभरता है और   फिर मन से बुद्धि फलकर कार्यरत हो जाती है. इसी क्रम में बुद्धिसे बुद्धत्व फले तभी विकास का वृत्त पूरा हो. परन्तु अक्सर मन-बुद्धि की प्रक्रिया में, ध्यान खो जाने के कारण, बुद्धत्व की शक्यता समाप्त हो जाती है. -अरुण             

जानना, मानना और जागना

जान जानने के काम आती है, मन मानने के और ध्यान काम आता है जागने के. ----------------- जो जागा हुआ है, वह है जागा.... दोनों पर- एक ही साथ और एक ही वक्त. ‘ जानने’ और ‘मानने’ दोनों पर उसका ध्यान होने के कारण वह कभी भी confused (संभ्रमित) नही रहता. ------- Unconfused या स्पष्ट चित्त ही ध्यानस्थ भी है और प्रेमस्थ भी -अरुण              

जड़ को देखो और विवाद से उबरो

सारे विवाद मानने और न माननेवालों के बीच होते हैं, एक कहता है होता है तो दूसरा कहता है नही होता, झगडा है ‘होता’ और ‘नही होता’ के बीच जिसे किसी भी झगड़े या विवाद की जड़ दिख गई उसके दिमाग में विवाद का वृक्ष उगता ही नही -अरुण        

आदमी सिर्फ बटोरता है

किनारों से गुजरती हुई पहुँच जातीं हैं नदियाँ समंदर में बिना समेटे तजुर्बों को जो आते रहे,जाते रहे, मिलते रहे बिछुड़ते रहे   हर पल हर वक्त..... और नदियाँ सिर्फ उठाती रहीं लुफ्त अपनी रवानी का ........     परन्तु आदमी जिस रास्ते से गुजरता है उस रास्ते को ही बटोरता चला जाता है बिना अपनी गुजरन और रफ़्तार को देखता निहारता और जब आखिर हिसाब करने बैठता है तो पाता है कि सिवा कंकड़ पत्थर और धूल के कुछ भी हासिल न हुआ -अरुण      

संबंधों का दर्पण

बिना संबंधों के जीना आदमी के लिए संभव कहाँ ? कोई संबंधों के दर्पण में स्वयं की खोज जारी रखते हुए रूपांतरित होते हैं , प्रेम जगाते हैं तो कोई संबंधों में अपना   निहित स्वार्थ खोजते हुए मैत्री और दुश्मनी का सिलसिला चालू कर देते हैं - अरुण