Friday, December 3, 2010

आशय एक, अभिव्यक्ति भिन्न

नींद ही नींद से करती बातें

जागनेवालों में होती नही चर्चा कोई

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देखना बंद हुआ बोलना हुआ चालू

ये जहाँ बोलनेवालों से ही आबाद हुआ

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ये घना फैल चुका है लफ्जों का नगर

के समझ लफ्जों तले घुंटती मरी जाती है

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ख़ामोशी- भीड़ में रहती है अकेली न हुई

हर दो लफ्ज के दरमियान बसा करती है

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बोलने और सुनने वाले में न फर्क कोई

एक ही जहन निभाता, दो अलग किरदार

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