तीन दोहे

मानुस निर्मित जगत में, धरम गया है हार
पैर सत्य के छीनकर, उन पर झूठ सवार
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सत खोजन को चल पड़े, बनती पद की रेख
हम तो बस चलते रहे, उस रेखा को देख
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मंदिर मूरत सामने, लेता अँखियाँ मीच
निराकार को देखता, बैठे मस्जिद बीच
................................................... अरुण

Comments

Anonymous said…
"पैर सत्य के छीनकर, उन पर झूठ सवार"
यथार्थ - बहुत सुंदर