Thursday, November 28, 2013

चेतना बंटी और मन उभरा



नदी का पानी हर क्षण बहती धारा में नया का नया है।
किनारे खड़े पेड़ की छाया ने प्रवाह का कुछ हिस्सा ढक दिया है।
ढका हिस्सा रुका, थमासा लगता है।
नदी दो टुकड़ों में बँट गई ।
वर्तमान पर भूत की छाया पसरी
चेतना बंटी और मन उभरा
- अरुण

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