Friday, October 15, 2010

हम मन बनकर जी रहे हैं

मान लिया जाए कि कुँए का पानी

बिलकुल ही निस्वाद हो

न मीठा, न कड़वा, न तीखा,,न कसैला ...

कोई भी स्वाद नही

स्वाद जिस गिलास से पीया जाए,

उस गिलास में ही लगा हो

तो पीने वाले को कुए का पानी

उस स्वाद का महसूस होगा

जिस स्वाद का उसका गिलास होगा

जीवन बिलकुल निस्वाद है

न सुख की मिठास है और न

न दुःख की खटास

मन की अवस्था के अनुसार

कभी खुशी महसूस होती है तो

कभी गम

हम जीवन से नही जी रहे

हम मन बनकर जी रहे है

........................................ अरुण

1 comment:

POOJA... said...

जीवन बिलकुल निस्वाद है

न सुख की मिठास है और न

न दुःख की खटास

मन की अवस्था के अनुसार

कभी खुशी महसूस होती है तो

कभी गम

हम जीवन से नही जी रहे

हम मन बनकर जी रहे है
best lines... true poem...