Wednesday, August 20, 2014

जस भाव तस प्रभाव

शरीर की जगह ही विचार है, विचार के पीछे ही भाव है, भाव में ही सारा जीवन प्रभाव है, इसीलिए जैसा भाव है वैसा ही जीवन फलित हुआ दिखता है। जैसा ह्रदय होगा वैसा ही होगा विचार और वैसी ही होगी शरीर से अभिव्यक्त कृति या आचरण। ह्रदय अगर शुद्ध, भक्तिपूर्ण हो तो कृति भी निस्वार्थ प्रेममय होगी। ह्रदय अगर 'मै' और 'तू' में विभक्त हो तो आचरण भी स्वार्थ एवं कपटमय होगा।
- अरुण
 

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