Saturday, November 22, 2014

एक गजलनुमा नज़्म

मालूम हो सुबह को... कहाँ पे आना है
अंधेरे में दिया.. जलाए रखिये
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गर आँखों को परछाइयाँ सताने लगें
रोशनी पे आँखें .... गडाए रखिये
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आसमां भी उसमें सिमटना चाहेगा
मुहब्बत को ऊपर.... उठाए रखिये
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किनारे भी टूटेंगे किसी रोज़ आख़िर
तूफ़ाँ को अपना .... बनाए रखिये
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आसमां से जो टूटा.. नही लौटा तारा
हर मौज को.. समंदर में मिलाए रखिये
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- अरुण

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