Wednesday, November 26, 2014

आज की तीन रुबाई

आज की तीन रुबाई
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'मै' पुराना...लग रहा फिर से जवां
याद में ही ख्वाब होता है रवां
'मै' धुआँ..इसके अलावा कुछ नही
जल गयी जो जिंदगी उसका धुआँ
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बेलफ्ज् ख़ालीपन था.. पूरा भर दिया
जो नया देखा.. ख़याली  कर दिया
सूरत-ए-लम्हात देखी ही नही
दस्तक-ए-लम्हात से दिल भर दिया
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हम किसी भी हाल में .. भरपूर होते
हम किसी के साथ भी...खुशनूर होते
ये अकेलापन हमें महफ़ूज़ लगता
जोड़ क़ुदरत के..न दिल से दूर होते
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- अरुण

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