Tuesday, November 2, 2010

और अब सब अलग अलग

सारी कहानी एक ही जीवंत क्षण में

घट रही है

सूरज है, किरणें हैं, धूप है

गर्मी है, है पसीना

है पसीने की नमी का बदन को छूता स्पर्श

सूरज से लेकर उस स्पर्श और उसके भी

आगे का सारा अनुभव एक ही क्षण में

भीतर के खालीपन को छूता है

पर जैसे ही उस खालीपन में देखनेवाला उभर आता है

सारी बातें बट जाती हैं

सूरज अलग, किरणे अलग, धूप भी कहीं दूर अलग

और पसीने का अनुभव भी अलग ही अलग

पहले एक का एक और अब

सब अलग अलग

....................................... अरुण



2 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर भावों को सरल भाषा में कहा गया है. अच्छी रचना

संजय भास्कर said...

बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..