Monday, December 1, 2014

तीन रुबाई आज के लिए

पत्तों को पेड़ का तो कोई पता नही
लहरों को समंदर का कोई पता नही
पानी में बुलबुलों को हमने दिया वजूद
पानी को बुलबुलों का कोई पता नही
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जिसमें यह वक़्त गुज़रता... ऐसी उलझन
जिससे दिल बैठ ही जाता.... ऐसी उलझन
उलझने लाख...उलझने ही जिंदगी का सबब
जो स्वयं सुलझा हुआ, उसको ना कोई उलझन
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जाननेवाले ने नही जाना... 'जानना' क्या है?
जाना है सभी, तो फिर जानना क्या है?
जानना तो यहाँ कुछ भी नही.... यारों !
'जाननेवाला' ही...न हो, तो जानना क्या है?
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- अरुण

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