Saturday, December 13, 2014

दो रुबाई आज के लिए

दो रुबाई आज के लिए
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आइना हो साफ़ आँखें साफ़ हों
बस हक़ीक़त से तभी इंसाफ़ हो
एक नन्हें की तरह देखा करो
सीधा पहलू हो असल दरयाफ़* हो

दरयाफ़ = दरयाफ़्त = खोजबीन
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बेखुदी गर... जिंदगी किस काम की ?
बेरुहानी बंदगी किस काम की ?
खोज का सामान जब ज़िंदा नही
जुस्तजू-ए- जिंदगी किस काम की ?

जुस्तजू-ए- जिंदगी= जिंदगी की खोज
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अरुण

1 comment:

Ankur Jain said...

सुंदर प्रस्तुति।