Thursday, December 11, 2014

दो रुबाई आज के लिए

दो रुबाई आज के लिए
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नही ख्यालात-ओ-जज़्बात हटेंगे सर से
जंग जारी रहे बाहर.. तो रहे भीतर से
जबतलक एक भी चिंगारी रहे जंगल में
नही आज़ाद कुई पत्ता...आग के डर से
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मंदिरों और मस्जिदों के शिखर फ़लकों पर
मज़हबी शोर के हर दौर उठे फ़लकों पर
कार के पुर्ज़ों  की दुकानें कई हैं लेकिन
एक भी दिखती नही कार कहीं सड़कों पर
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 फ़लकों पर= आकाश में
- अरुण

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