Wednesday, June 23, 2010

चित्र बने विचित्र

चित्रकार रंगों का प्रयोग कर
चित्र बनाता है
अपनी कल्पना में बसे चित्र को
कागज पर प्रतिबिम्बित करता है
इस प्रतिबिम्बन या रेखाटन को
जहाँ जैसे रंगों कि जरूरत हो
उन रंगों का इस्तेमाल कर सजीव बनाता है
ऐसा करते वक्त उसके मन में
न किसी रंग विशेष का आग्रह है और
न तो विरोध -
वह अभ्रष्ट चित्त से सृजन कर रहा है
परन्तु भ्रष्ट मन से
यानी किसी मत, पक्ष, या विकल्प का आग्रह या
विरोध लिए की जाने वाली हर कृति
भ्रष्ट होगी,
विचित्र होगी
............................................... अरुण

1 comment:

Maria Mcclain said...

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