Wednesday, June 30, 2010

मुक्ति

पिंजड़े का पंछी

खुले आकाश में आते

मुक्त महसूस करे

यह तो ठीक ही है

परन्तु अगर

पिंजड़े का दरवाजा

खुला होते हुए भी

वह पिंजड़े में ही बना रहे और

आजादी के लिए प्रार्थना करता रहे तो

मतलब साफ है

आजादी के द्वार के प्रति वह

सजग नही है

वह कैद है

अपनी ही सोच में

................................... अरुण




8 comments:

आचार्य जी said...

सुन्दर लेखन।

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर!

सुज्ञ said...

बहुत ही सारगर्भित!!
साधुवाद!
लालसाओं के भंवर में फ़ंसे मुक्ति चाहक भी तुच्छ सुखों के प्रलोभन में मुक्तिद्वार देख ही नहिं पाते।

वह कैद है अपनी ही सोच में

Sunil Kumar said...

सारगर्भित!!बहुत सुन्दर!

Mrs. Asha Joglekar said...

या कि आलसी जो पर फैला कर उड जाना ही नही चाहता । बैठे बिठाये जो मिल रही है ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अच्छी अभिव्यक्ति.....दोनों पहलू हो सकते हैं...या तो सजग नहीं है या आलसी है

हमारीवाणी.कॉम said...

बढ़िया है!

थोडा सा इंतज़ार कीजिये, घूँघट बस उठने ही वाला है - हमारीवाणी.कॉम



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राजकुमार सोनी said...

कम शब्दों में बहुत जबरदस्त लिख डाला है आपने।