Wednesday, August 18, 2010

छिटक कर सागर से ......

छिटक कर सागर से

मछली तट पर आ गिरी

छटपटाती है लौट जाने को

धीरे धीरे ...

एक नही, दो नही,

कई छटपटाती मछलियाँ मिलती हैं

बनाती हैं - समाज

समाज- जो बुनता है

अपना कल्पना-जाल

जिसके नीचे छुपकर मछलियाँ

दबा देती हैं

अपनी छटपटाहट

................................. अरुण

1 comment:

Sunil Kumar said...

सच्चाई को दर्शाती एक सुंदर रचना , बधाई