Monday, August 9, 2010

सम्पूर्णनिष्ठता

विज्ञान वस्तुनिष्ठ है और

कला है व्यक्तिनिष्ठ

रहस्य को जाननेवाला

क्षण क्षण सम्पूर्णनिष्ठ है

जगत में अपने को देखते समय ही

अपने में जगत को देखता रहता है

दृष्टि की व्यापकता ही

उसका स्वभाव है

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कोई देखे वस्तु को कोई मन की छाय

अपने को देखत रहो देखत जगत सराय

...................................... अरुण


1 comment:

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!