Tuesday, July 20, 2010

भागना भी है और ठहराना भी

या तो भागते रहो

या ठहर जाओ

दोनों बातें एक

ही वक्त नहीं हो सकतीं

हाँ एक काल्पनिक उपाय है

भागते हुए ही

कल्पना करो कि

ठहरे हुए हो

आदमी धर्म को

अपने जीवन में कुछ इसीतरह

अपना रहा है

............................................ अरुण

1 comment:

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!