Friday, July 9, 2010

मन है एक आड

प्रकाश के आड़े आने वाली चीज

धरती पर अपनी परछाई बनी देखती है

वह चीज प्रकाश के रास्ते से हट जाए तो

उसकी परछाई लुप्त हो जाती है

अपनी जगह पर खड़े खड़े वह चीज

अपनी परछाई को हटा नहीं सकती, मिटा नहीं सकती

न ही उसे किसी भी तरह गायब कर सकती है

जीवन की सीधी अनुभूति के आड़े खड़ा

मनुष्य का मन

जीवन को अपनी ही

परछाई से ढक देता है

जबतक मन

निर्मन न हो जाए

जीवन प्रकाशमान न हो सकेगा

.................................................. अरुण


1 comment:

Udan Tashtari said...

बढ़िया!