Saturday, July 17, 2010

कबीर रहस्यवादी नहीं हैं

सीधा सादा जगत है, सीधे सीधे देख

तिरछी को तिरछा दिखे, दिखती तिरछी रेख

सीधा सादा आदमी

अपनी सीधी नजर से

जगत को सीधे सीधे देखता है

पर उसकी बानी रहस्य

मालूम पड़ती है उनको

जो जगत को सीधे सीधे

देख नहीं सकते क्योंकि

उनकी नजर तिरछी है

संस्कारित है

कबीर रहस्यवादी नहीं हैं

न उनकी बानी किसी रहस्य

को दर्शा रही है

हम उन्हें समझ नहीं पा रहे

क्योंकि नजर हमारी

सीधी नहीं है.

........................................... अरुण


3 comments:

Udan Tashtari said...

सही है!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी पोस्ट आज चर्चा मंच पर भी है...

http://charchamanch.blogspot.com/2010/07/217_17.html

Divya said...

तिरछी को तिरछा दिखे, दिखती तिरछी रेख ..

majority of the people are like this..jab kuchh jalebi ki tarah dikhta hai unhe.