Wednesday, July 21, 2010

फिर मन से मौन की ओर

आदमी मौन लेकर

पैदा होता है और

अनायास ही

समाज का संपर्क होते ही

उसमें मन फल उठता है

पर मन से मौन प्रयास करने पर भी

फल नहीं पाता

जो चीज टूट गई

वह जुड सकती है

पर अटूट नहीं हो सकती

द्वैत से अद्वैत फल नहीं सकता

इस बात का जीवंत बोध ही

कि द्वैत शुद्ध भ्रान्ति है

अद्वैत है

.................................... अरुण





2 comments:

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!

वाणी गीत said...

इस बात का जीवंत बोध ही
कि द्वैत शुद्ध भ्रान्ति है
अद्वैत है...

सही है ..