Friday, April 27, 2012

यूँ ही बाँहों में सम्हालो के


यूँ ही बाँहों में सम्हालो के
सहर होने तक,
धड़कने दिल की उलझ जाएँ
गुफ्तगू कर लें

जुबां से कुछ न कहें,
रूह्भरी आँखों में
डूबकर वक्त को खामोश
बेअसर कर लें

जुनूने इश्क में बेहोश और
गरम सांसे
फजा की छाँव में
अपनी जवां महक भर लें

बेखुदी रात की
तनहाइयों से यूँ लिपटे
बेखतर दिल हो,
सुबह हो तो
बेखबर कर ले
-अरुण

4 comments:

yashoda agrawal said...

कल 27/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .

धन्यवाद!

उपासना सियाग said...

बहुत सुन्दर कविता .......

sushma 'आहुति' said...

waah! behtreen bhaav....

Reena Maurya said...

सुन्दर प्रेमपगी रचना....
सुन्दर भाव बिखेरती रचना....