Wednesday, April 25, 2012

समय को विश्राम दो


समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर
आस में जो थक गया उस रूप का श्रृंगारकर  

नयन में बन ढल गये जलकण तुम्हारे धीर के
ओंठ पर अब सो रहे हैं गीत लंबे पीर के
तपन में जो जल रहा सौंदर्य उसका ख्यालकर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर

धडकनों में भय समाया है गमक न प्रीत की
वेदना की गूँज है, अब गूँज ना मधु-गीत की
शुभ स्वरों को जन्म दो इस रुदन संहारकर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर

असहायता का बिम्ब अब मुखपर चमकता जा रहा
नैराश्य का ही भाव अब दिल में सुलगता जा रहा
लो आसमय दुनिया इन्ही हांथो का लो आधारधर
समय को विश्राम दो इस बाह में तन डालकर
-अरुण

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