निर्बंध छाँव



छाया ऐसी होवे जिसमें
तपन दाह शम जावे  
फिर भी सूरज की किरणों से
प्रकाश छन छन आवे
कोई बंधन नही किसी का
सूरज हो या छाया
सदा खुला हो दर असीम का
हो वास्तव या माया
-अरुण   

Comments

yashoda Agrawal said…
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अप्रतिम! मेरी बधाई आदरणीय!
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